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पित्रोदा का बयान एक बड़ी आबादी का अपमान

लोकसभा चुनावों में संविधान बदलने, लोकतंत्र पर खतरा, विरासत टैक्स के बाद अब रंग के आधार पर देश को बांटने जैसे आरोप-प्रत्यारोपों से सियासी तूफान मचा हुआ है। ताजा विवाद ओवरसीज कांग्रेस के प्रमुख...

पित्रोदा का बयान एक बड़ी आबादी का अपमान
Monika Minalहिन्दुस्तानThu, 09 May 2024 10:58 PM
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लोकसभा चुनावों में संविधान बदलने, लोकतंत्र पर खतरा, विरासत टैक्स के बाद अब रंग के आधार पर देश को बांटने जैसे आरोप-प्रत्यारोपों से सियासी तूफान मचा हुआ है। ताजा विवाद ओवरसीज कांग्रेस के प्रमुख सैम पत्रिोदा के बयान से उपजा है, जिसमें उन्होंने देश के लोगों को रंग के आधार पर नीचा दिखाने का प्रयास किया था। हालांकि, विवाद बढ़ने के बाद उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया, जिसे कांग्रेस नेतृत्व ने तत्काल स्वीकार कर लिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस पर प्रतक्रियिा देने में कोई देरी नहीं की। उन्होंने कहा कि सैम पत्रिोदा का बयान बर्दाश्त से बाहर है। उनके मुताबिक, ह्यशहजादेह्ण के अमेरिका में रहने वाले अंकल की यह टप्पिणी नस्लीय है और देशवासी त्वचा के रंग को लेकर अपमान कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे। कांग्रेस ने स्वाभाविक ही इस बयान से किनारा कर लिया, हालांकि इससे पहले सैम पत्रिोदा ने भारत में विरासत टैक्स लगाने संबंधी बयान दिए थे, जिस पर उनको काफी आलोचना का सामना करना पड़ा था।
सवाल यह है कि मतदान के समय भारत के लोगों को भड़काना क्या कांग्रेस की सोची-समझी रणनीति है? अगर नहीं, तो एक बार विवादित बयान देने के बाद भी सैम पत्रिोदा को क्यों नहीं रोका गया? उन्होंने फिर से विवादित बोल क्यों बोले? दिलचस्प है कि सैम पत्रिोदा अपने बयान विदेश में रहकर जारी कर रहे हैं। ऐसे में, प्रधानमंत्री का यह कहना गलत नहीं जान पड़ता कि इन सबसे कांग्रेस का असली चेहरा सामने आता है। प्रधानमंत्री ने पलटवार करते हुए यह भी पूछ लिया कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को हराने के लिए कांग्रेस ने इतनी कोशिश क्यों की? त्वचा के रंग के आधार पर देश को बांटने वालों को यह भी पता होना चाहिए कि खुद भगवान श्रीकृष्ण की त्वचा का रंग हम सबकी तरह ही था। उल्लेखनीय है कि भारत में अलग-अलग क्षेत्र के लोगों के रीति-रिवाज, खान-पान, धर्म-भाषा आदि भन्नि होते हैं, लेकिन वे एक-दूसरे का बखूबी सम्मान करते हैं। यही वजह है कि राजनीतिक वश्लिेषक सैम पत्रिोदा के बयानों से कांग्रेस को चुनावी नुकसान होने के कयास लगा रहे हैं।
कुल मिलाकर, देश का एक अच्छा चुनावी-विमर्श बेमतलब नस्लीय दिशा में मुड़ गया। इसका दोषारोपण नश्चिति तौर पर सैम पत्रिोदा पर किया जाएगा। देश जब अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करने में इस कदर गंभीर है, तब ऐसे बयान देकर पत्रिोदा आम जनता की नजरों में खुद की और अपनी पार्टी की, दोनों की इज्जत दांव पर लगा रहे हैं। इससे उनको नुकसान ही होगा, फायदा नहीं।
युगल किशोर राही, टिप्पणीकार 

उन्होंने भारत की विविधता को ही जाहिर किया
सैम पत्रिोदा को भले कुछ लोग कठघरे में खड़ा करने का प्रयास रहे हैं, लेकिन उन्होंने जो कहा, वह भारत का अपमान नहीं है। वह तो देश की विविधता को ही सामने रख रहे थे, जो हमारी सबसे बड़ी ताकत है और जिस पर हम इतराते हैं। उनका कहना था, ह्यहम भारत जैसे विविधता वाले देश में रहते हैं। भारत में पूरब के लोग चीनी जैसे, पश्चिम के लोग अरब जैसे, उत्तर के लोग गोरे दिखते हैं। दक्षिण के लोग अफ्रीकी जैसे दिखते हैं। इसके बावजूद सब मिल-जुलकर रहते हैं। हम सब भाई-बहन हैं।ह्ण इस बयान में आखिर कौन सी ऐसी बात कह दी गई कि सैम पत्रिोदा को इस तरह घेरा जा रहा है और उनको इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया गया? वास्तव में, उनके बयान को काट-छांटकर प्रसारित किया गया और उनके खिलाफ माहौल बनाया गया। हम भारतीयों के साथ दक्कित यही है कि हम आधी-अधूरी बातें सुनकर भावनात्मक रूप से कमजोर पड़ जाते हैं। इसी कारण हमें छला भी जाता रहा है। इस बार भी यही हुआ है। सैम पत्रिोदा के खिलाफ उस बयान के आधार पर माहौल बनाया गया, जिसमें उन्होंने भारत की तारीफ ही की है। चूंकि वक्त चुनाव का है, इसलिए कांग्रेस ने भी बचाव की कोई कोशिश नहीं की, क्योंकि अब चुनावी हवा उसके पक्ष में बनती दिख रही है और इस एक बयान से उसे चुनाव में नुकसान हो सकता था। इस लिहाज से कांग्रेस ने अच्छी तरह से इस मामले को संभाल लिया है। अब देखना यह है कि आगे उस पर किस तरह से हमला करने की कोशिश की जाती है। 
दीपक चौधरी, टिप्पणीकार

यह गाली कैसे हुई
इंडियन ओवरसीज कांग्रेस के अध्यक्ष सैम पत्रिोदा ने इस्तीफा दे दिया, जिसे कांग्रेस नेतृत्व ने स्वीकार भी कर लिया। यह संगठन का आंतरिक मसला है, जिस पर मैं कोई टप्पिणी नहीं करूंगा। मगर सैम पत्रिोदा ने भारतीय नृजातीय विविधता का जो उदाहरण दिया, वह कैसे गलत है, यह समझ से परे है। नृजातीय आधार पर दक्षिण भारत के कई नृवंशीय समूह अफ्रीकी लोगों से साम्य रखते हैं। नृजातीय विशेषता के आधार पर की गई तुलना कब से गाली हो गई? अफ्रीकी होना गाली है क्या? अगर हां, तो प्रधान जी ने जी-20 में अफ्रीकी देशों को सदस्यता क्यों दिलवाई? जब नेल्सन मंडेला को ह्यदक्षिण अफ्रीका का गांधीह्ण कहा जाता है, तो यह हमारे लिए काफी गर्व की बात मानी जाती है, लेकिन अफ्रीकी लोगों से भारत के एक नृजातीय समूह की तुलना गाली हो जाती है। बड़ी अजीब थ्योरी है यह।
रनीश जैन, टिप्पणीकार