फोटो गैलरी

अगला लेख

अगली खबर पढ़ने के लिए यहाँ टैप करें

Hindi News ओपिनियन साइबर संसारएक अकेला सब पर पड़ा भारी

एक अकेला सब पर पड़ा भारी

डेढ़ दर्जन से भी अधिक दलों ने एड़ी-चोटी का जोर लगाकर नरेंद्र मोदी को सत्ता से हटाने का बीड़ा उठाया था, लेकिन चुनावी नतीजे बताते हैं कि वे अपनी मंशा में सफल नहीं हो पाए। उनका ‘इंडिया’ समूह भाजपा के...

एक अकेला सब पर पड़ा भारी
default image
Monika Minalहिन्दुस्तानWed, 05 Jun 2024 10:45 PM
ऐप पर पढ़ें

डेढ़ दर्जन से भी अधिक दलों ने एड़ी-चोटी का जोर लगाकर नरेंद्र मोदी को सत्ता से हटाने का बीड़ा उठाया था, लेकिन चुनावी नतीजे बताते हैं कि वे अपनी मंशा में सफल नहीं हो पाए। उनका ‘इंडिया’ समूह भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन, यानी राजग से पार नहीं पा सका। भले ही इंडिया दंभ भर रहा हो, लेकिन सच यही है कि नरेंद्र मोदी अकेले सब पर भारी रहे। राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस शतक के करीब तक पहुंच गई और अखिलेश यादव ने भी उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को एक नई ऊंचाई दे दी। उधर, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस भाजपा से सीटेें छीनने में सफल रही और द्रमुक ने दक्षिण में अपना दमखम दिखाया। फिर भी, अकेली भाजपा सब दलों से आगे रही है। अकेले उसे इतनी सीटें आई हैं, जितनी ये तमाम पार्टियां मिलकर भी नहीं जुटा पाईं। और ‘इंडिया’ ब्लॉक तो 250 का आंकड़ा भी नहीं पार कर सका, बहुमत को खैर दूर की बात है। स्पष्ट है, तमाम प्रयासों के बावजूद नरेंद्र मोदी अपने तीसरे कार्यकाल की ओर बढ़ गए हैं और उन्होंने उन सबको करारा जवाब दिया है, जो कहते थे कि संविधान खतरे में है या आरक्षण का लाभ छीना जा सकता है। अब सबको साफ हो जाना चाहिए कि न आरक्षण खत्म किया जा रहा है, न संविधान बदला जा रहा है।
महेश नेनावा, टिप्पणीकार

जीत का अर्थ 
2024 के संसदीय चुनाव का परिणाम सामने आने के साथ चुनाव-पूर्व दावों और एग्जिट पोल के अनुमानों की धुंध छंट चुकी है। अब भले नरेंद्र मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बनकर पंडित जवाहरलाल नेहरू के रिकॉर्ड की बराबरी कर लें, मगर उनकी चमक फीकी पड़ेगी। इससे कितनों की छाती ठंडी हुई होगी, इसका अनुमान लगाया जा सकता है। भाजपानीत एनडीए का कमजोर होना भारत-विरोधी पड़ोसी देशों, जेहादियों, टुकडे़-टुकडे़ गैंग, परिवारवादी-जातिवादी  समूहों व कानून के शिकंजे तक खींच लाए गए माफिया-भ्रष्टाचारी पृष्ठभूमि के राजनीतिज्ञों के लिए उत्सव सरीखा है। विडंबना यह कि एकजुट नकारात्मक शक्तियों की जीत का यह राजमार्ग करोड़ों सुविधाभोगी, आत्मकेंद्रित और सुकुमार सज्जनों की आत्मघाती निष्क्रियता के जड़ पत्थरों ने तैयार किया है। हालांकि, सुखद यह है कि इस परिणाम में चुनाव आयोग की साख, उसकी निष्पक्षता और ईवीएम पर भरोसा कायम हुआ। वास्तव में, देश की जनता ने ऐसा जनादेश दिया है कि मोदी जी नेहरू की बराबरी भी करें और वाजपेयी की तरह गठबंधन धर्म का पालन करते हुए कमजोर सरकार चलाएं।
कुमार दिनेश, टिप्पणीकार

भाजपा के दिन अब लदने लगे
पिछले कुछ महीनों से जोर-शोर से यह भ्रम फैलाया जा रहा था कि इस बार काफी धूमधाम से 400 पार करके मोदी सरकार वापसी कर रही है। विशेषकर उत्तर प्रदेश में रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा के बाद यह उम्मीद जताई गई थी कि इस बार योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश की सारी सीटें बड़ी आसानी से भाजपा जीतने वाली है। यहां से सपा और कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो जाएगा। फिर, मोदी की गारंटी और योगी के दमदार शासन की घुट्टी कुछ इस तरह से जनता को पिलाई गई थी कि ऐसा लगने लगा था, देश उत्तर प्रदेश की शासन-व्यवस्था से काफी प्रभावित है। फिर, जिस तरह से 1 जून को मतदान के आखिरी चरण के बाद टीवी चैनलों ने चीख-चीखकर उत्तर प्रदेश में फतह के साथ अबकी बार 400 पार का दावा करना शुरू किया, तो लगा, भाजपा चमत्कार करने जा रही है। मगर 4 जून का नतीजा अप्रत्याशित दिखा। इन नतीजों ने न केवल नरेंद्र मोदी और अमित शाह के सपने को तोड़ा, बल्कि उत्तर प्रदेश के शासन को लेकर भ्रम भी दूर कर दिया। इंडिया ब्लॉक का असर देश के दूसरे हिस्सों में भी दिखा और 400 पार के नारे की हवा निकल गई। आलम यह रहा कि स्वयं भाजपा भी इस बार अपने दम पर 272 सीटेें नहीं जुटा सकी। जाहिर है, यह अब एनडीए के लिए आत्ममंथन का समय है। उसे अपने सभी सहयोगी दलों को सहेजकर रखना होगा। यह नतीजा बताता है कि अब हिंदू-मुस्लिम की राजनीति को छोड़ना जरूरी है। जब देश में शिक्षित बेरोजगारों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है, तब अमीरों को फायदा पहुंचाने के बजाय गरीब, मध्यम वर्ग के हितों की योजनाएं बनाने की तरफ सरकार को ध्यान देना चाहिए। अन्यथा, अभी जो बाजी पलटते-पलटते रह गई है, वह आगे चलकर पूरी तरह से पलट भी सकती है।
मनमोहन राजावत राज, टिप्पणीकार

कठघरे में गारंटी
आखिरकार वही हुआ, जिसका अंदेशा था। जनता-जनार्दन ने अपना रुख स्पष्ट करते हुए सरकार की गारंटी को कठघरे में खड़ा कर दिया। सबसे दिलचस्प नतीजा उत्तर प्रदेश का है, जहां न तो राम मंदिर का अलौकिक मुद्दा चला और न ही मुफ्त अनाज का खेल। बिहार में भी नीतीश कुमार बड़े राजनीतिक खिलाड़ी बनकर उभरे हैं और उनके रुख पर बहुत कुछ टिका होगा। वैसे, उनका तीर अभी निशाने पर है और उनका राजनीतिक भाव भी बढ़ चुका है। बंगाल और कर्नाटक में भी सत्तारूढ़ दल को नुकसान उठाना पड़ा है। साफ है, यह नतीजा एनडीए के लिए आंखें खोलने वाला साबित हो रहा है।
हर्षवर्द्धन, टिप्पणीकार