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खुशहाल देशों के राज

मैंने अब तक जितनी यूरोपीय महिलाओं से इस मामले में बातचीत की, लगभग नब्बे प्रतिशत किसी न किसी मनोरोग विशेषज्ञ से जुड़ी हैं। यह मैं सामान्य महिलाओं की बात कर रहा हूं। पुरुषों से भी मिलते रहते हैं, जो कभी न कभी कन्सल्ट करते हैं, लेकिन महिलाएं स्कूल के समय से ही नियमित हैं। मैंने पूछा कि उनसे क्या बतियाती हैं? कहा कि हल्के-फुल्के तनाव- जैसे बेटी से विवाद हो गया, पति से हो गया, किसी घटना से तनाव हो गया। वहां जाकर बतियाने से तनाव उतर जाता है। और वाकई उनकी जीवनशैली से लगता है कि अपना तनाव किसी के सिर पर यूं डाल आई हैं, जैसेे रोज कचरा फेंकते हैं। उसके बाद वे मस्त रहती हैं।

यह कुछ-कुछ पुराने जमाने के गिरजाघर कन्फेशन जैसा है, जहां अब कोई जाता नहीं। एक तो मनोवैज्ञानिकों के पास बेहतर टूल्स हैं, दूजा पादरी के पास ट्रेनिंग की कमी है। मनोवैज्ञानिकों के पास शहर के अधिकतर घरों के रहस्य फाइलों में बंद हैं। मेरी उनसे भी बात होती है, पर वे कोई निजी बात नहीं बताते। वे सभी तनावों को जमा कर अपने दराजों में भरते चले जाते हैं। ‘हैप्पीएस्ट कंट्री’ के सभी तरह के तनावों से भरे ऐसे दराज अगर इकट्ठे कर लिए जाएं, तो अल्फे्रड नोबेल भी कह उठेंगे कि मैंने तो चिनिया फटक्का बनाया, असली बम तो यह है।

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  • Web Title:hindustan cyber sansar column on 7th September