Hindustan Cyber Sansar Column on 13th June - जोखिम उठाकर प्रतिरोध DA Image

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जोखिम उठाकर प्रतिरोध

किसी ने ठीक कहा है कि जब पूंजी का दबदबा, आत्मग्रस्तता, धार्मिक आस्था और प्रतीकवाद अपने चरम पर हों, तब सामाजिक न्याय व मानव अधिकारों के आंदोलन हाशिये पर जाने लगते हैं या निस्तेज पड़ जाते हैं। कुछ ऐसा ही दौर है इस समय। चूंकि राज्य का वर्तमान चरित्र उत्तर सत्य राजनीति व मीडिया (पोस्ट ट्रुथ पॉलिटिक्स ऐंड मीडिया) के पक्ष में दिखाई देता है, जहां ‘सत्य को असत्य, असत्य को सत्य’ में आसानी से बदला जा सकता है, इसलिए सिविल सोसाइटी को सक्रिय भूमिका निभाने की जरूरत है। याद रखें, प्रतिरोध की गैैर-मौजूदगी में समाज के दबे-कुचले लोगों के मानवाधिकारों पर राज्य और उसके अंगों के हमले बढ़ जाते हैं; सांविधानिक संस्थाएं निष्प्रभावी बनने लगती हैं। जनता और राज्य के बीच अविश्वास का वातावरण बनने लगता है।

ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर के राजनीतिक सलाहकार रॉबर्ट कूपर ने 2003 में ही एशियाई लोकतंत्र के बारे में चेतावनी दी थी कि वहां लोकतंत्र नाकाम होते दिखाई दे रहे हैं। राष्ट्र के रोजमर्रा के व्यवहार में लोकतंत्र और मौलिक अधिकार झलक नहीं रहे, इसलिए आज का ‘नागरिक धर्म’ है नागरिक चेतना को ज्वलंत रखना और सिविल सोसाइटी को हर स्तर पर सक्रिय होकर राजसत्ता पर ‘राजधर्म’ के पालन के लिए दबाव बनाए रखना।

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  • Web Title:Hindustan Cyber Sansar Column on 13th June