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कजरारे मौसम में

हम हैं। सामने सरोजजी हैं, यानी सरोज वर्मा, टीवी स्क्रीन पर। गा रही हैं- नीक सैयां बिन भवनवा...। भाषा का लचीलापन लोक ने अपनी फुकती में गठिया रखा है, वरना ये ‘खड़ी बोली’ वाले तो ‘देसज’ शब्द संपदा को कब का खारिज कर चुके होते। ‘नीक’ कहां मिलेगा! सरोजजी भवन शब्द नहीं बोलतीं, भवनवा को उठाती हैं। इस भवनवा में केवल घर नहीं होता, इसमें पोखर, नीम गाछ, झूला, सावन की झड़ी से परेशान दालान टपकने लगता है। एक जगह से नहीं, इसमें अनेक दरारें हैं, हर जगह से पानी टपक रहा है। हर टपक के नीचे एक बर्तन है फर्श पर। कटोरा, थारी, लोटा, गिलास, परई...। पानी बरस रहा है। दालान चू रहा है। बूंद-बूंद। हर बर्तन बूंदों की अलग आवाज निकाल रहा है।

सरोज वर्मा कथरी ओढ़े फर्श के इस संगीत का मजा ले रही हैं। गर वह मना कर दें कि उनके दालान की छत में ‘एक्को’ छेद ना है, तो उनकी जगह हमें समझ लिया जाए। भरी दोपहरी में, कजरारे मौसम में, जब बदरी झर रही हो, तो मन कम्बख्त बेवजह भीगता है। ख्वाब नहीं, खयाल उठता है ज्वार-भाटे की तरह। सरोजजी, हमने कथरी को एहतियात से उठाया और अपने को त्रिभंगी बनाकर उसमें डाल दिया है। बयार चौतरफा है। दखिनहिया भी जोर मार रही है।

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  • Web Title:Hindustan Cyber Sansar Column on 13th July