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देर भले हो गई है

जब हर तरफ वहशत डेरे डालने लगे, तो अचानक कोई उम्मीद आकर कांपता हुआ हाथ थाम लेती है। लाखों में एक-दो व्यक्ति थे, जिन्होंने नौकरशाह बनकर जनसेवा का ख्वाब देखा होगा और वे बड़े अफसर बन भी गए हों। मगर एक दिन यह सोचकर अपना भविष्य एक त्यागपत्र में रख दें कि हमारा दिल नहीं मानता कि देश को जिस दिशा में ले जाया जा रहा है, हम भी उसी बहाव में बह जाएं। 

मायूसी के हाले में से झांकती यह खबर भी कितनी अच्छी लगती है कि जंतर-मंतर पर छोटी सी भीड़ नारे लगा रही हो कि तुम देश के साथ जो कर रहे हो हमारे नाम पर, मत करो। या सीमा पार किसी अखबार में आग लगाने वाले कॉलमों के बीच छपा यह लेख कितना महत्वपूर्ण है कि ‘दो एटमी ताकतों का जोश हमें सिर्फ नरक की ओर धकेल सकता है’। 

यह बात भी कितनी आशाजनक है कि कश्मीर सुलटे या न सुलटे, पर करतारपुर कॉरिडोर की प्रक्रिया पटरी से नहीं उतरनी चाहिए। या भारत से अभी सारा व्यवहार बंद रहेगा, मगर जीवनरक्षक दवाओं में इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल पाकिस्तान लाने पर पाबंदी नहीं होगी। ये बताते हैं कि देर भले हो गई हो, मगर अंधेर नहीं हुआ है। रोशनी की अपनी दुनिया है। हमें इस पर ही आना पड़ता है, भले वक्त बर्बाद किए बगैर आ जाओ या तबाही के रास्ते आओ। आना तो पड़ेगा।

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  • Web Title:hindustan cyber sansar column on 10 september