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संग्रहालय हमेशा बने रहेंगे प्रासंगिक

आज (18 मई) अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस है। संग्रहालयों का हमारे जीवन में महत्व किसी से छिपा नहीं है। असल में, कोई भी पौधा पेड़ बनने के बाद तभी तक जीवित रहता है, जब तक वह अपनी जड़ों से जुड़ा रहता है...

संग्रहालय हमेशा बने रहेंगे प्रासंगिक
Monika Minalहिन्दुस्तानFri, 17 May 2024 09:47 PM
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आज (18 मई) अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस है। संग्रहालयों का हमारे जीवन में महत्व किसी से छिपा नहीं है। असल में, कोई भी पौधा पेड़ बनने के बाद तभी तक जीवित रहता है, जब तक वह अपनी जड़ों से जुड़ा रहता है। संग्रहालय हमारे लिए यही भूमिका निभाते हैं। दुनिया के विकास को याद रखने के लिए हमें इनकी पग-पग पर जरूरत पड़ती है। चूंकि अपनी धरोहरों, परंपराओं, संस्कृति आदि को संभालकर रखना चाहिए, इसलिए दुनिया के तमाम देश अतीत की अपनी स्मृतियों को संजोना पसंद करते हैं और तमाम अवशेषों एवं कलाकृतियों को सुरक्षित स्थान पर रखते हैं, जिसे संग्रहालय कहा जाता है और जहां उस देश के लोग अपना इतिहास देखने व समझने जाते रहते हैं। इस लिहाज से कोई भी संग्रहालय आने वाली पीढ़ियों और अतीत की स्मृतियों के बीच एक ऐसा पुल है, जो वर्तमान को इतिहास से जोड़ता है। इसीलिए संग्रहालय महत्वपूर्ण माने गए हैं।
आज दुनिया भर में कई सारे पुराने और लोकप्रिय संग्रहालय मौजूद हैं। इनका महत्व समझाने के उद्देश्य से ही हर साल अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस मनाया जाता है। इस दिवस की लोकप्रियता इतनी बढ़ गई है कि साल 2009 तक इसे मनाने वाले देशों की संख्या लगभग 90 थी, लेकिन अब यह आंकड़ा बढ़कर 130 के करीब पहुंच गया है। माना जाता है कि दुनिया भर में 30 हजार से भी अधिक संग्रहालय इस दिवस को मनाते हैं। 
आज संग्रहालयों की प्रासंगिकता किसी भी अन्य समय की तुलना में कहीं अधिक जान पड़ती है। एक ऐसे दौर में, जब फर्जी खबरें ज्यादा तेजी से फैलती हैं, संग्रहालय हमें तथ्यों से अवगत कराते हैं। ये अपने आगंतुकों को वस्तुओं अथवा कला की व्याख्या करने और सवाल करने में सक्षम बनाते हैैं। बेशक, संग्रहालय विभिन्न प्रकार के होते हैं। कुछ कला क्षेत्र से जुड़े होते हैं, तो कुछ इतिहास से, तो कुछ प्राकृतिक इतिहास या पुरातत्व आदि से, लेकिन ये सभी हमारी सांस्कृतिक पहचान और अन्य संस्कृतियों के साथ हमारे संबंधों के बारे में बताते हैं और हमें बौद्धिक रूप से समृद्ध बनाते हैं। हमें इसकी आवश्यकता भी है, क्योंकि खिड़की अगर बंद हो, तो किसी भी कमरे में घुटन होने लगती है। कुछ लोग तर्क देते हैं कि नई प्रौद्योगिकी संग्रहालयों को अनावश्यक बना रही है। मैं इससे बिल्कुल सहमत नहीं हूं, क्योंकि यह लोगों के अनुभव और जानकारी प्राप्त करने के तरीके में व्यापक बदलाव ला रही है। आगंतुकों के अनुभव को बढ़ाने के लिए ही डिजिटल अभिलेखागार जैसी संकल्पना सामने आई है। इसके सुखद नतीजे दिख रहे हैं, यानी प्रौद्योगिकी इसकी पूरक है, विरोधी नहीं।
दिव्यांश, टिप्पणीकार

धीरे-धीरे घटता दिख रहा महत्व
एक सही संग्रहालय हमें पुराने दिनों की झलक दिखाते हैं। यह झलक ऐसी भी होती है, जो हमें सबक दे सकती है और जिसके आधार पर हम अपना भविष्य संवार सकते हैं। मगर आज के समय में संग्रहालयों को शायद ही उतना महत्व मिल रहा है, जिसके वे हकदार हैं। देश के कुछ चुनिंदा संग्रहालयों को छोड़ दें, तो बाकी सबकी दुर्दशा इसकी तस्दीक करती है। स्थिति यह है कि कई संग्रहालयों के भवन जीर्ण-शीर्ण हो चुके हैं, उनमें सहेजे गए ऐतिहासिक सामान या तो चोरी हो गए या नष्ट हो रहे हैं, साफ-सफाई की कोई खास व्यवस्था नहीं दिखती, प्रबंधन के मोर्चे पर तमाम तरह की गड़बड़ियां हैं और जरूरी कर्मचारियों की भारी कमी है। आलम यह है कि सरकारों का ध्यान भी इन समस्याओं की ओर शायद ही जाता है। कहने को कुछ धन जरूर जारी कर दिए जाते हैं, लेकिन वह राशि क्या संग्रहालय तक पहुंचती है या क्या उसका उचित इस्तेमाल हो रहा है, यह जानने की सुध सरकारों के पास नहीं होती। 
चूंकि हमारा तंत्र अपनी विरासत को संजोने के काम में संजीदा नहीं दिखता, इसलिए आम लोग भी अब शायद ही संग्रहालय जाना पसंद करते हैं। उपेक्षा का भाव इतना अधिक होता है कि शहर के दर्शनीय स्थलों की जब सूची बनाई जाती है, तो उसमें स्थानीय लोग शायद ही अपने संग्रहालय का नाम लेते हैं, जबकि, सरकारों की तरफ से यदि प्रयास किया जाए और संग्रहालयों को संजोने का प्रचार-प्रसार हो, तो काफी सारे लोग इनमें आना पसंद करेंगे और अपने इतिहास को समझने के लिए उत्सुक होंगे।
यहां हमें तकनीकी उन्नति पर भी ध्यान देना होगा। तकनीक के फायदे भी हैं, तो नुकसान भी कुछ कम नहीं हैं। नई-नई प्रौद्योगिकियों का यदि सकारात्मक इस्तेमाल हो, तो संग्रहालयों को पुनर्जीवन दिया जा सकता है। ऐसा हमने कई देशों में देखा भी है, जहां तकनीक से विरासत को संजोने का काम शिद्दत से किया गया। मगर अपने देश में तकनीक के नकारात्मक पक्ष ही अधिक दिखते हैं। संग्रहालयों को छोड़ दें, तो ज्यादातर जगहों पर तकनीक की सुविधा महज कर्मचारियों तक सीमित है और उसका लाभ ऐतिहासिक वस्तुओं की सुरक्षा में नहीं उठाया जाता। और, यदि कहीं तकनीकी सुविधाएं बढ़ाई भी गई हैं, तो वहां कर्मचारी ही इतने दक्ष नहीं रखे गए कि वे तकनीक का बेहतर इस्तेमाल कर सकें। स्पष्ट है, यदि हम अपने संग्रहालयों को सुरक्षित रखना चाहते हैं, तो कई मोर्चों पर मेहनत करनी होगी व नई प्रौद्योगिकियों का सकारात्मक इस्तेमाल करते हुए संग्रहालयों को आम जनजीवन से जोड़ना होगा, अन्यथा आज नहीं तो कल हमारे संग्रहालय भी इतिहास बनकर रह जाएंगे।
सौरभ शुक्ला, टिप्पणीकार