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मां अपने बच्चों के लिए आज भी पूजनीय

रविवार (12 मई) को ‘मदर्स डे’ है। यह दिवस पूरी तरह से मां को समर्पित होता है। ऐसे किसी भी दिवस की प्रासंगिकता काफी अधिक है, क्योंकि मां के बिना मानव जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। अगर मां न...

मां अपने बच्चों के लिए आज भी पूजनीय
Monika Minalहिन्दुस्तानFri, 10 May 2024 09:11 PM
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रविवार (12 मई) को ‘मदर्स डे’ है। यह दिवस पूरी तरह से मां को समर्पित होता है। ऐसे किसी भी दिवस की प्रासंगिकता काफी अधिक है, क्योंकि मां के बिना मानव जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। अगर मां न होती, तो हमारा अस्तित्व ही नहीं होता। इसीलिए मां के नाम सिर्फ एक दिन नहीं होना चाहिए, बल्कि साल के हर दिन को मातृ दिवस के रूप में मनाया जाना चाहिए। कहा भी जाता है कि ईश्वर ने मां को इसलिए बनाया कि यह उसकी तरह ही सृजन करती है। यह एक ऐसा नाम है, जिसमें खुद भगवान वास करते हैं। जब नवजात शिशु इस दुनिया में आता है, तो सबसे ज्यादा खुशी बच्चे की मां को ही होती है। अपने बच्चे के लिए वह कुछ भी करने को तैयार रहती है। यही कारण है कि पिता अगर संतान के लिए बट वृक्ष माने जाते हैं, तो मां उसकी घनी-शीतल छाया। 
एक बच्चे के जीवन में मां-बाप की अहमियत शायद ही किसी से छिपी है। वे बच्चों की जिंदगी में एक सांचे की तरह काम करते हैं और उनके भविष्य को सही आकार देते हैं। माता-पिता अपने बच्चों में अच्छा संस्कार भरते हैं और उनको जीवन की मुश्किलों से निर्भीक होकर लड़ने के लिए तैयार करते हैं। चूंकि बच्चे को सही दिशा उसके मां-बाप ही दिखाते हैं, इसलिए बच्चे भी उनके लिए सब कुछ करने को तत्पर रहते हैं। विशेषकर मां के प्रति बच्चों का सम्मान हमेशा दिखता है। कुछ लोग आरोप लगाते हैं कि आज की पीढ़ी अपने मां-बाप का ख्याल रखने के मामले में कमजोर है। यह सरलीकरण है।  इसमें कोई दोराय नहीं कि कुछ बच्चे माता-पिता की उपेक्षा करते हैं और चकाचौंध से भरी इस दुनिया में अपनी जननी से भी दूरी बना लेते हैं। मगर इनको अपवाद ही मानना चाहिए। आमतौर पर आज भी मां का ख्याल पहले जैसा रखा जाता था। भारत के ज्यादातर घरों में मां के प्रति बच्चों में विशेष अनुराग दिखेगा। 
आज का समाज काफी हद तक भौतिकवादी हो गया है, फिर भी अपने बीजक को शायद ही भूल सका है। हम अपने आसपास ही ऐसे अनगिनत नौजवानों को देख सकते हैं, जो सिर्फ इसलिए अपने घर से दूर हाड़-तोड़ मेहनत या मजदूरी कर रहे हैं, ताकि उनके घर की रोजी-रोटी आराम से चलती रहे और उनकी मां को मेहनत-मजदूरी न करनी पड़े। ऐसे में, मां का ख्याल न रखने जैसा आरोप लगाने या नई पीढ़ी को कोसने से बचा जाना चाहिए। भारत एक ऐसा देश है, जो अपनी परंपराओं के साथ आगे बढ़ रहा है और हमारी परंपरा बच्चों को अपने मां-बाप के आशीष की छांव में चलना सिखाती है, उनसे दूर होना नहीं।
स्वाति चौहान, टिप्पणीकार

अब उनका पहले जैसा सम्मान नहीं होता
दुनिया के तमाम देश मई के दूसरे रविवार को मातृ दिवस, यानी ‘मदर्स डे’ मनाते हैं। यह दिन 8 मार्च को मनाए जाने वाले अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस से अलग है, क्योंकि यह माना गया कि कोई भी मां सिर्फ एक महिला नहीं होती, बल्कि एक सर्जक होती है। इसीलिए उसे अपने बच्चे से असीम लगाव होता है और उसकी जरा सी तकलीफ से व्याकुल हो उठती है। मां का दुलार बच्चे के लिए दवा जैसा काम करता है, इसलिए ममता और स्नेह के इस रिश्ते को संसार का सबसे खूबसूरत रिश्ता कहा गया है। इस मामले में भारत की स्थिति दुनिया के अन्य देशों से काफी अलग थी। यहां के लोगों के लिए मां से प्रेम सदैव अद्भुत और अकल्पनीय माना जाता रहा है। मगर अब तस्वीर बदलती दिख रही है, जो दुखद व निराशाजनक है।
हम पश्चिमी देशों की नकल करके आज जरूर मदर्स डे मनाते हैं, पर क्या वास्तव में अपनी मां से उतना प्यार करते हैं, जितना करना चाहिए या उनको वाजिब सम्मान देते हैं? विशेषकर नई पीढ़ी व्यस्त दिनचर्या, बाहरी भागदौड़, नौकरी के तनाव या छोटे परिवार की वजह से मां को भूलती जा रही है। स्थिति यह है कि कई परिवारों में बुजुर्ग महिलाएं बोझ समझी जाने लगी हैं। उनकी सुध लेने को कोई तैयार नहीं। वे एकांत में चुपचाप बैठी या लेटी रहती हैं और टुकुर-टुकुर सबको निहारती रहती हैं। कोई उनके पास बैठने को तैयार नहीं होता। हां, कभी-कभी घर के बच्चे जरूर उनके साथ वक्त बिताते हैं, लेकिन यह भी किसी न किसी दबाव में किया जाता है, स्वेच्छा से नहीं। यही कारण है कि आज देश के वृद्धाश्रमों में भी जगह नहीं मिलती। मानो सभी बच्चे अपने मां-बाप को वृद्धाश्रम में रखकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेना चाहते हैं। 
संभवत: इन्हीं सबके कारण केंद्र सरकार ने यह कानून बनाया कि जो बच्चे अपने मां-बाप के साथ अपमानजनक व्यवहार करते हैं या जो उनको अपने साथ नहीं रखते, उनको पैतृक संपत्ति से बेदखल किया जा सकता है। बुरे बर्ताव के लिए उनको जेल भी भेजा जा सकता है। जाहिर है, यह कानून इसलिए बनाया गया, ताकि आज की पीढ़ी को सही रास्ते पर लाया जा सके। हम सिर्फ एक दिन मदर्स डे या फादर्स डे मनाकर अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन नहीं कर सकते। हमें वास्तविक अर्थों में अपने माता-पिता का ख्याल रखना चाहिए और उनको पर्याप्त सम्मान देना चाहिए। अगर हम ऐसा नहीं कर सकते, तो हमें उनकी संतान कहलाने और पैतृक संपत्ति का अधिकार भी नहीं मिलना चाहिए। केंद्र सरकार को जल्द से जल्द  ऐसाकोई कानूनी संशोधन करना चाहिए।
सुमन सिंह, टिप्पणीकार