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स्लिप और टंग-स्लिप

बचपन में क्रिकेट कमेंट्री खूब सुनी जाती थी। तब अजित वाडेकर कप्तान हुआ करते थे। आखिरी बल्लेबाज चंद्रशेखर होते थे, जो आठ-दस रन बना लें, तो बहुत होते थे। उनके आने पर दबाव डालने के लिए विरोधी टीम द्वारा चार-पांच स्लिप लगा दी जाती थी। उधर गेंद उछली और उधर लपका। इन दिनों मीडिया वाले कमजोर बल्लेबाजों के लिए पांच-छह स्लिप लगाकर रखते हैं। जैसे ही जुबान फिसली खट से लपक लेते हैं और उसे लेकर पूरे स्टेडियम का चक्कर लगा देते हैं। हालांकि यह जरूरी नहीं है कि जुबान फिसलना ही है। न फिसले, तो ये अपने ही शब्द उनकी जुबान में ठूंस सकते हैं और उसे वापस लपक भी सकते हैं।

क्रिकेट और राजनीति, अब दोनों भद्र जनों का खेल नहीं रही। दोनों पर कॉरपोरेट का कब्जा है। अंपायर और थर्ड अंपायर, सब सेट हैं। एक पुराना किस्सा याद आ रहा है। अंपायर की एक बल्लेबाज पर खास मेहरबानी थी। एलबीडब्ल्यू, कॉट-बिहाइंड, रन आउट, सबसे उसे अभयदान दे रखा था। आखिरकार बॉलर ने एक गुगली फेंकी और तीनों स्टंप व गिल्लियां जमीन पर बिखर गईं। बॉलर ने पूछा, ‘हाऊ इस दैट?’ अंपायर ने चिढ़कर कहा, ‘देख नहीं रहे, सारे स्टंप गिर गए हैं?’ बॉलर ने मुस्कराते हुए पूछा, ‘हां, पर आउट है कि नहीं?’ क्रिकेट और राजनीति में कुछ भी हो सकता है।

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  • Web Title:Hindustan Cyber Sansar Column May 15