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केदारनाथ के दृश्य गंभीर खतरे के संकेत

केदारनाथ के कपाट खुलने पर जो दृश्य दिखाई दिया, उसे गंभीर संकट का आगम जानना चाहिए। हमारे धाम, विशेष क्षेत्र में विशेष नियमों से बांधे गए हैं, जो मूल रूप में ऋतु से बंधे सृष्टि के नियम हैं। मगर जो...

केदारनाथ के दृश्य गंभीर खतरे के संकेत
Monika Minalहिन्दुस्तानMon, 13 May 2024 08:21 PM
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केदारनाथ के कपाट खुलने पर जो दृश्य दिखाई दिया, उसे गंभीर संकट का आगम जानना चाहिए। हमारे धाम, विशेष क्षेत्र में विशेष नियमों से बांधे गए हैं, जो मूल रूप में ऋतु से बंधे सृष्टि के नियम हैं। मगर जो नया हिंदुत्व है, वह सनातन दर्शन को जानने-समझने और आत्मोत्थान के पुरुषार्थ-चतुष्टय को मानने वाला आचरण और विचार नहीं रखता है। इसमें आस्था धार्मिक विश्वास से अधिक प्रदर्शन का विषय बन गई है। लोगों में अपनी आधी-अधूरी समझ से कर्मकांड, मान्यताओं का कुतर्की विश्लेषण कर नए-नए आचरण स्थापित करने की होड़ मची है। बहुत कम लोगों में गंभीरता और निष्ठा दिखती है। 
हिमालय क्षेत्र में साधना के नियम हैं। बद्रीनाथ में शंख तक नहीं बजाया जाता है। कोलाहल, प्रदूषण नियंत्रण के इतने उच्च मानक पारंपरिक रूप से रखे गए हैं। मगर केदारनाथ में जिस तरह ढोल-नगाड़ा बजा और अंधाधुंध भीड़ के साथ उच्चतम स्तर पर नारों का शोर सुनाई दिया, उससे ईश्वर तो प्रसन्न नहीं ही होंगे, उल्टे वहां की सूक्ष्म ऊर्जा का लय जरूर बिगड़ जाएगा। वास्तव में, देवता ऊर्जा के पुंज होते हैं, जिन्हें भारतीय मनीषा ने अध्यात्म के चरम स्तर पर जाकर समझा है। यदि इस बिंदु पर खड़े होकर भी हम नहीं चेते, तो फिर अवसर भी नहीं मिलने वाला और इसके दोषी सिर्फ हम होंगे, कोई दूसरा नहीं। 
ऊर्जा केंद्रों के साथ अनावश्यक छेड़छाड़, अतिक्रमण या किसी भी प्रकार के प्रदूषण, कोलाहल पर पूरी तरह से रोक होनी चाहिए। ये क्षेत्र दुर्गम ही रहने चाहिए। हमें समझना होगा कि ऐसे अध्यात्म साधना क्षेत्र सूक्ष्म जगत के प्राणियों के साधना स्थल हैं। उन्हें तंग करने का तमाशा बंद होना चाहिए, अन्यथा परिणाम शीघ्र ही सामने होगा। जो जहां है, वहीं धर्माचरण करे। जप, ध्यान, साधना, भजन, सत्संग करे। गुरु, मंदिर, यथायोग्य पात्र की सेवा करे। यथोचित प्रकृति अनुरूप व्यवहार करे। दैवी शक्तियों की कृपा प्राप्त होगी। हर किसी की परंपरा में दोष निकालने के लिए जबरन विशेषज्ञ बनने वाले, भोज्य-अभोज्य, पहनावा, परंपरा, रीति-रिवाज पर विरोध में झंडा बुलंद करने वालों को इस प्रकार का तमाशा नहीं दिखाई देता, जिसका दुष्प्रभाव पूरे देश, समाज, राष्ट्र, प्रकृति और पर्यावरण पर होगा! किसी भी क्षेत्र के स्थानीय नियम और अधिकार- क्षेत्र में टांग अड़ाने, मौज-मस्ती ढूंढ़ने की प्रवृत्ति अनुचित है। यदि यह समझ आ जाए, तो ठीक, अन्यथा प्रकृति तो समझा ही देगी, लेकिन वह समझाने की जो कीमत लेगी, वह बहुत बड़ी होगी।
    अभिलाषा द्विवेदी, टिप्पणीकार

इसे लोगों की भीड़ नहीं, आस्था कहिए
विश्व विख्यात केदारनाथ धाम के कपाट विधि-विधान से पूजा-अर्चना के बाद खोल दिए गए। इस अवसर पर आस्था का मानो सैलाब उमड़ आया। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी इस अवसर के गवाह बने। लोगों में जोश इतना था कि हर तरफ बाबा केदार के जयकारे लग रहे थे। ढोल-नगाडे़ भी बजाए जा रहे थे। ये सब मानो स्वत: स्फूर्त था। यह एक अलग तरह का रोमांच था, जिसे सभी दर्शनाथी महसूस कर रहे थे। आखिर यह रोमांच हो भी क्यों नहीं? बाबा केदारनाथ के दर्शन करने के लिए सुबह से ही हजारों की संख्या में श्रद्धालु वहां जमा हो गए थे। कपाट खुलने के बाद बाबा केदारनाथ की विधिवत पूजा-अर्चना हुई और भक्तों के ऊपर फूलों की बारिश की गई। यह नए भारत का संकेत है। यह बताता है कि लोग अब अपनी आस्था को खुलकर जाहिर करने लगे हैं। वे अब किसी से दब-छिपकर अपनी आस्था का पालन नहीं करते। यहां यह बताने की जरूरत नहीं है कि लोगों में यह भरोसा क्यों आया है?
कुछ लोग इसकी आलोचना कर रहे हैं। उनको लगता है कि इससे यहां की प्रकृति को नुकसान पहुंच रहा है। उनके मुताबिक, प्रकृति इसका बदला ले सकती है? ये सब बातें वास्तव में आस्थावान लोगों में भय पैदा करने के लिए कही जा रही हैं? बाबा केदार अपने भक्तों से कभी नाराज नहीं हो सकते। अगर कुछ अधिक संख्या में लोग एक जगह इकट्ठा होकर अपने आराध्य की आराधना कर रहे हैं, तो भला इसमें क्या दिक्कत है? वैसे भी, केदारनाथ धाम बिल्कुल खुला हुआ है। ढोल अथवा नगाडे़ की ध्वनि से जो नाद उत्पन्न हो रहा था, उसे सिर्फ वही महसूस कर सकता है, जो केदार का भक्त हो। वे स्वर लोगों के अंतर में उतर रहे थे और सभी केदारनाथ की आस्था की गंगा में डूबकी लगा रहे थे।
ऐसे आयोजनों पर सवाल उठाकर हमें श्रद्धालुओं की आस्था पर चोट नहीं करनी चाहिए। यह सही बात है कि प्रकृति है, तभी हम हैं, लेकिन अब प्रकृति के प्रति लोग पहले से अधिक संजीदा हो गए हैं। वे समझ गए हैं कि हमें प्रकृति की हरसंभव रक्षा करनी होगी, तभी हमारी भी रक्षा हो सकेगी। इसलिए, यह नहीं कह सकते कि जान-बूझकर ऐसा आयोजन किया गया और स्थानीय पारिस्थितिकी को जान-बूझकर खतरे में डाला गया। यह सब आस्था का मामला है और इसे आस्था की नजर से ही देखना चाहिए। एक दिन का आयोजन शायद ही स्थानीय प्रकृति के लिए कथित तौर पर नुकसानदेह हो सकेगा। यह बात कथित पर्यावरणविदों को भी समझ लेनी चाहिए।
    दीपक रस्तोगी, टिप्पणीकार