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हमारा धर्म

धर्मों ने मनुष्यता को जितना दिया है, उससे ज्यादा छीना ही है। दुनिया में सबसे ज्यादा नरसंहार धर्म के नाम पर ही हुए हैं। भूख, बीमारी और युद्ध से ज्यादा इंसानी जान धर्मों ने ली हैं। आज के वैज्ञानिक युग में भी धार्मिक कट्टरता ने दुनिया को नर्क बनाया हुआ है। और यह तब है, जब दुनिया के सभी धर्म पे्रम, अमन, करुणा और भाईचारे की ही बात करते हैं। तो चूक आखिर कहां और कैसे हुई हमसे? चूक शायद यह हुई कि हममें से कोई अपना धर्म अपने होशोहवास में ख़ुद नहीं चुनता। जन्म के साथ हम सबों पर यह हमारे परिवार और समाज द्वारा जबरन लादा जाता है।

एक बच्चे को होश संभालने के पहले किसी धर्म में दीक्षित कर देना, उसके मानवाधिकारों का हनन है। जहां जन्म लेते ही सोच को भोथरा करने की कोशिशें शुरू हो जाएं, वहां संवेदना कम, कट्टरता ही ज्यादा होगी। ईमान की बात तो यह है कि पैदा होने वाले बच्चे को किसी धर्म का नहीं माना जाना चाहिए। स्कूलों में उसे सभी धर्मों की बुनियादी शिक्षा दी जाए। संस्कृति, नैतिकता और सामाजिकता के निर्माण में धर्मों के योगदान की जानकारी दी जाए। उसे यह भी बताया जाए कि इन धर्मों की आड़ में अब तक दुनिया में कितने विनाश हुए हैं। बालिग होने के बाद उसे अपना धर्म खुद चुनने की आजादी हो। और हां, आजादी उसे यह भी हो कि वह किसी धर्म को न चुने।

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  • Web Title:Hindustan Cyber Sansar Column June 8