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मिर्जापुर कइल गुलजार हो

हमारे एक मित्र हैं प्रमोद मिश्रा, असी घाट के ‘सुबहे’ वाले। इनके पिता परिपूर्णानंद मिश्र बनारस में दारोगा थे। किस्सा है आदमपुर का, लेकिन बना रहे बनारस, इसे दूसरी तरफ मोड़कर एक साथ कई विभूतियों को अमर कर दिया। जब तक यह कजरी पेंग मारती रहेगी, मरहूम परिपूर्णानंद जी, बिस्मिल्लाह खान साहब, तो जिंदा रहेंगे ही, काशी की रवायत भी बोली जाती रहेगी, और वह है तवायफ तमीज। बनारस में एक मशहूर थाना है चौक।

पीछे तवायफों का मुहल्ला दालमंडी, सामने मणिकर्णिका घाट वाया कचौड़ी गली। इसी थाने पर परिपूर्णानंद जी बहैसियत दारोगा पहुंचे। दालमंडी का खलल उन्हें बर्दाश्त नहीं हुआ और वह मय लाव-लश्कर चल पडे़ वहां। कहते हैं कि बहुत कहर ढाया। बनारस के जो कई स्थाई भाव रहे हैं, उनमें से एक है जुल्म के खिलाफ टकराव। तवायफों ने ठान लिया- मिसिर हटाओ। मगर कैसे?

दालमंडी में ही रहते थे बिस्मिल्लाह खान। तवायफों को मालूम था कि गवर्नर साहब ने खान साहब की तारीफ की है। तवायफें अड़ गईं। बात करिए गवर्नर से।... और दारोगाजी भेज दिए गए मिर्जापुर। नतीजे में एक जुलूस निकाला। बिस्मिल्लाह खान आगे-आगे, पीछे नाचती-गाती तवायफें- मिर्जापुर कइल गुलजार हो, कचौड़ी गली सुन कइल बलमू।  कादंबरी का मदनोत्सव भी फीका हो गया था।

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  • Web Title:Hindustan Cyber Sansar Column June 25