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इंदिरा गांधी भी यहां खा चुकी हैं मात

यह सच है कि रायबरेली की संसदीय सीट से कांग्रेस खूब फली-फूली है। सबसे पहले 1952 में फिरोज गांधी यहां से चुनकर संसद पहुंचे थे। वह अगले चुनाव में भी विजयी हुए। इसके बाद इंदिरा गांधी की यह सीट रही और...

इंदिरा गांधी भी यहां खा चुकी हैं मात
Monika Minalहिन्दुस्तानTue, 07 May 2024 09:49 PM
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यह सच है कि रायबरेली की संसदीय सीट से कांग्रेस खूब फली-फूली है। सबसे पहले 1952 में फिरोज गांधी यहां से चुनकर संसद पहुंचे थे। वह अगले चुनाव में भी विजयी हुए। इसके बाद इंदिरा गांधी की यह सीट रही और उनके नहीं रहने पर सोनिया गांधी ने इसे संभाला। अब राहुल गांधी ने नेहरू-गांधी परिवार की इस विरासत को आगे बढ़ाने के लिए यहां से पर्चा भरा है। यहां प्रियंका वाड्रा के चुनाव लड़ने की चर्चा भी चल रही थी, लेकिन कांग्रेस ने राहुल को प्रत्याशी बनाकर सारा ऊहापोह खत्म कर दिया। राहुल गांधी के नामांकन के समय सोनिया गांधी, अशोक गहलोत, प्रियंका गांधी जैसे नेता मौजूद थे। उप-चुनावों को भी यदि जोड़ लें, तो रायबरेली सीट से 17 बार कांग्रेस जीत चुकी है, जबकि दो बार भाजपा के अशोक सिंह और एक बार जनता पार्टी के राज नारायण यहां से विजयी हुए हैं। बसपा और सपा का यहां अब तक खाता भी नहीं खुल सका है।
फिर भी, यह कहना सही नहीं होगा कि राहुल गांधी के सामने जीत की थाली परोस दी गई है। रायबरेली के मतदाता बेहद जागरूक रहे हैं और उनको पता है कि कौन उनके हित में तत्पर रहा है? यही कारण है कि रायबरेली के लोग कुरसी देना जानते हैं, तो धूल चटाना भी उनको खूब आता है। 1977 का चुनाव ही याद कीजिए। आपातकाल से नाराज लोगों ने उन इंदिरा गांधी को हरा दिया, जिन्हें ‘लौह महिला’ कहा जाता है और जो 1967 से यहां की सांसद थीं। जनता पार्टी के राज नारायण ने उनको मात दी थी, जबकि उन दिनों इंदिरा गांधी के सितारे बुलंद थे और वह मजबूत शख्सियत की धनी मानी जाती थीं। इसी तरह, 1996 और 1998 में भाजपा के अशोक सिंह ने यहां के लोगों का प्रतिनिधित्व किया। 
राहुल गांधी के लिए रायबरेली ठीक उसी तरह एक ‘सुरक्षित सीट’ है, जिस तरह कभी अमेठी को सुरक्षित माना जाता था। उल्लेखनीय है कि अमेठी में पिछले चुनाव में उनको हार का सामना करना पड़ा था। रायबरेली में उनका मुकाबला दिनेश प्रताप सिंह जैसे नेताओं से है, जो लगातार जमीन पर काम कर रहे हैं। नेहरू-गांधी परिवार बेशक रायबरेली को अमेठी से ज्यादा महत्व दे और इसे अपने लिए एक भावनात्मक व ऐतिहासिक मुद्दा बनाए, लेकिन रायबरेली ऐसी सीट है, जिस पर कभी इंदिरा गांधी को भी करारी हार का सामना करना पड़ा है। इसीलिए, कांग्रेस को आत्म-मुग्धता से बचना होगा। अगर पड़ोसी सीट अमेठी का इतिहास यहां भी दोहरा दिया गया, तो कांग्रेस पार्टी के लिए बहुत बुरी स्थिति
हो जाएगी। 
कांतिलाल मांडोत, टिप्पणीकार

रायबरेली ने हमेशा वफादारी निभाई
असल में, हम लोगों की यह आदत हो गई है कि जो हमें ठीक लगता है, वही सबसे ठीक बात है। अमेठी में राहुल गांधी को हराया गया था, आप सबको बुरा लगा था, मगर जिसे हराया गया था, उसे कितना बुरा लगा होगा कि उसने जीवन भर जिनके लिए काम किया, वे ऐन मौके पर दगा दे गए? कुछ लोग कहते हैं कि वहां बहुत पैसा बांटा गया, तो भाई, रायबरेली के लोगों को क्या यह ऑफर नहीं दिया गया था, मगर जो वफादारी रायबरेली ने निभाई है, यह उसका हक है कि उसे राहुल जैसा सांसद ही मिले। बाकी जिनको लगता है कि अमेठी के लोग प्रायश्चित में थे, कह रहे थे कि केवल पर्चा भर दें, हम राहुल को जिता देंगे। वे अगर वाकई में मानते हैं कि उनसे पूर्व में गलती हुई है, तो प्रायश्चित करें और शर्मा जी को जिताएं। राहुल गांधी ने उन पर भरोसा किया था, अब वे राहुल पर भरोसा करें। यही है उनके लिए सबसे बड़ा प्रायश्चित। वैसे भी, किसी भी प्रायश्चित की पहली शर्त यही होती है कि इसमें कोई शर्त या मांग नहीं लगाई जाती है।
बाकी जीतने के बाद भी राहुल रायबरेली नहीं छोड़ेंगे। यह उनकी परंपरागत सीट है। अच्छा लगा कि वह बिना किसी सोशल मीडिया के दबाव के इस फैसले तक पहुंचे। सौ की सीधी एक बात। लीडर ने फैसला ले लिया। उत्तर प्रदेश में आप उन्हें मांगते थे, वह आ गए। अपनी बगल की सीट वह बैठकर हरा देंगे। बस भरोसा रखिए। इतना हो-हल्ला मत मचाइए कि विरोधी दल के काम आने लगने लगिए। और एक बात। हर बात जो हम लोग समझते हैं, वैसी ही नहीं होती है। अमेठी के डीएम और चुनाव आयोग के अंदर के बहुत से इनपुट्स राहुल के पास हैं। यह पहली बार है कि विरोधी दल की तैयारी का खाका राहुल के पास है। आज आपको भले बुरा लग रहा हो, मगर 4 तारीख को आप उन्हें सही कहिएगा।
मार्केट में पैसा राहुल के नाम पर चलता है। यह राहुल भी अच्छे से जानते हैं, दो-तीन दिन गुजरने दीजिए, सब साफ होने लगेगा। अभी बस एक गुजारिश है कि जिस तरह राहुल जी अमेठी को ले रहे हैं, आप भी लीजिए। अपनी बात और मुद्दों पर अड़े रहिए। वही असली चुनावी मुद्दे हैं। राहुल की समझ पर मुझे कोई शक नहीं है और न ही प्रश्न है। एक बात समझ लीजिए, लीडर पर यकीन होना ही पहली शर्त है। ढुलमुल यकीन, यकीन नहीं होता। राहुल का निर्णय बिना प्रश्न के कुबूल है। उन्होंने बहुत सोच-समझकर यह कदम बढ़ाया है। 
हफीज किदवई, टिप्पणीकार