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आम लोगों के मुद्दे नहीं उठाए जा रहे

आज, यानी 7 मई को मतदान का तीसरा चरण है। इसके बाद चार चरणों की वोटिंग बाकी है, जिसके लिए चुनाव प्रचार जोरदार तरीके से चल रहा है। सभी दल और नेता एक-दूसरे को घेरने का प्रयास कर रहे हैं। आरोपों..

आम लोगों के मुद्दे नहीं उठाए जा रहे
Monika Minalहिन्दुस्तानTue, 07 May 2024 12:03 AM
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आज, यानी 7 मई को मतदान का तीसरा चरण है। इसके बाद चार चरणों की वोटिंग बाकी है, जिसके लिए चुनाव प्रचार जोरदार तरीके से चल रहा है। सभी दल और नेता एक-दूसरे को घेरने का प्रयास कर रहे हैं। आरोपों-प्रत्यारोपों का खेल अनवरत जारी है। हालांकि, आम लोगों की यही उम्मीद होती है कि चुनाव के दौरान नेतागण मुद्दे की ही बात करें, काम की चर्चा करें और देश के भविष्य की झलक दिखाएं, लेकिन ऐसा लग रहा है कि अब ज्यादातर चुनावों में जनहित के मुद्दे उठते ही नहीं। ले-देकर धर्म और जाति की बातें ही हावी हैं, जो किसी भी लोकतंत्र की बेहतरी के लिहाज से अच्छी तस्वीर नहीं हो सकती है।
इस बार के आम चुनाव में जहां भारतीय जनता पार्टी खुले तौर पर कांग्रेस पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगा रही है और दावा कर रही है कि कांग्रेस ओबीसी का आरक्षण घटाकर मुसलमानों को दे सकती है, वहीं कांग्रेस की ओर से दावा किया जा रहा है कि भाजपा आरक्षण और संविधान, दोनों को खत्म करने की कोशिश में है। उसके मुताबिक, फिर से भाजपा सरकार बनते ही देश का संविधान बदल दिया जाएगा। सिर्फ यही दावे-प्रतिदावे नहीं हो रहे। कांग्रेस पर यह आरोप भी लगाया जा रहा है कि यदि उसकी सरकार बनी, तो वह लोगों से विरासत टैक्स वसूल करेगी और उनके मंगलसूत्र तक हड़प लेगी, जबकि इसके विरोध में दावा किया जा रहा है कि भाजपा ने तो अभी ही लोगों को गरीब बना दिया है। इन मुद्दों के बीच में भगवान राम को भी शामिल कर लिया गया है और लोगों में यह कहकर जोश भरने का प्रयास किया जा रहा है कि भगवान राम को लाने वाले को जिताया जाएगा और रामलला के प्राण-प्रतिष्ठा समारोह से दूर रहने वालों को हराया जाएगा। हालांकि, कभी-कभी विकास के दावे-प्रतिदावे को लेकर भी आवाज उठाई जाती है, लेकिन जितना महत्व जाति-धर्म के मुद्दे को दिया जा रहा है, उतना उनको नहीं मिल रहा। 
चूंकि चुनाव में उसी दल को जीत मिलती है, जो लोगों की भावनाओं को छू पाता है, इसीलिए इस बार के चुनाव में भी अपने-अपने तरीके से भावनात्मक मुद्दे उठाए जा रहे हैं। मगर ऐसा लगता है कि भावनात्मक मुद्दों के शोर में जरूरी मुद्दे गायब हो गए हैं। यह ठीक नहीं है। बेशक, हर राजनीतिक दल यही चाहता है कि किसी न किसी तरह से वह चुनाव जीत जाए, लेकिन मतदाताओं को जागरूक करना भी उसी की जिम्मेदारी है। वाजिब मुद्दों पर यदि सभी पार्टियां चुनाव लड़ेंगी, तो हमारा लोकतंत्र और भी समृद्ध व परिपक्व होगा। 
शैलेंद्र कुमार चतुर्वेदी, टिप्पणीकार
इस चुनाव में जनहित के मसले हावी
अठारहवीं लोकसभा के चुनाव को यह कहकर खारिज नहीं किया जा सकता कि इसमें जरूरी मुद्दे नहीं उठाए जा रहे हैं। क्या आलोचकों को यह नहीं दिख रहा है कि भारतीय जनता पार्टी विकास के नाम पर वोट मांग रही है? उसने पिछले दस वर्षों में देश में कितना बदलाव किया है, उसका हिसाब-किताब जनता के बीच परोस रही है और उसी के आधार पर अपने उम्मीदवारों के लिए जीत का आशीर्वाद मांग रही है। कांग्रेस की चुनावी-रणनीति भी विकास के ईद-गिर्द ही है। वह बेरोजगारी, गरीबी, महंगाई, अमीरों की कर्जमाफी जैसे जरूरी मुद्दों के साथ जनता के बीच जा रही है। क्या ये मुद्दे जनहित के नहीं हैं? गरीबी और महंगाई तो सीधे-सीधे आम लोगों से जुड़ा मसला है। मौजूदा सरकार के कार्यकाल में कितना विकास हुआ या महंगाई कितनी बढ़ी, इस बहस में यदि हम न भी जाएं, तब भी यह साफ-साफ दिख रहा है कि एक पार्टी अपने कामों के आधार पर लोगों से वोट मांग रही है, तो दूसरी पार्टी गलत नीतियां अपनाने के कारण उस दल को घेरने के प्रयास कर रही है। 
हां, यह सही है कि धर्म और जाति भी कुछ हद तक चुनावी मुद्दों में शामिल हैं, लेकिन ये मुद्दे तो भारतीय चुनाव के अभिन्न अंग जैसे हैं। शुरू से ही भारत में धर्म और जाति के आधार पर चुनाव लड़े जाते रहे हैं। अलबत्ता, हाल के वर्षों में इसमें कमी आई है और विकास जैसे मुद्दे हावी हुए हैं। इस बार भी बेशक धर्म और जाति की बातें हो रही हैं, लेकिन यह दाल में एक छौंक की तरह है। पूरी दाल तो विकास और जनहित के मुद्दों की ही पक रही है।
असल में, दिक्कत यह है कि भारतीय मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग अब भी इतना जागरूक नहीं हुआ है कि वह राष्ट्रीय मुद्दों को लेकर बहुत अधिक आग्रही बन सके। कुछ मतदाता जरूर राष्ट्र की सोचते हैं, लेकिन ज्यादातार लोग चुनाव में अपना फायदा ही देखते हैं। यही कारण है कि चुनाव के दौरान हम कई मतदाताओं को उस दल के लिए वोट डालते देखते हैं, जो उनको पैसे देते हैं या उनके लिए रेवड़ी संस्कृति को बढ़ावा देते हैं। यही कारण है कि धर्म और जाति से जुड़े भावनात्मक मुद्दे भी उठाए जाते हैं, ताकि लोगों के दिलों को टटोलकर उनको अपने पक्ष में किया जा सके। हालांकि, अच्छी बात यह है कि समझदार वोटरों की संख्या बढ़ रही है और वे सिर्फ धर्म और जाति के आधार पर ही अपना मत नहीं गिराते। इसी कारण इस बार भी विकास का मुद्दा हावी है।  इसी आधार पर वोट मांगे जा रहे हैं।
ज्योति कुमारी, टिप्पणीकार