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दक्षिण भारत में भी दबदबा बनाती भाजपा

इस बार भारतीय जनता पार्टी ने दक्षिण की 130 सीटों में से 29 पर सफलता हासिल की है और यह साबित कर दिया है कि भारत के दक्षिणी हिस्से में भी वह अपना दबदबा बढ़ा रही है। दक्षिण का राजनीतिक समीकरण भाजपा की...

दक्षिण भारत में भी दबदबा बनाती भाजपा
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Monika Minalहिन्दुस्तानThu, 13 Jun 2024 09:07 PM
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इस बार भारतीय जनता पार्टी ने दक्षिण की 130 सीटों में से 29 पर सफलता हासिल की है और यह साबित कर दिया है कि भारत के दक्षिणी हिस्से में भी वह अपना दबदबा बढ़ा रही है। दक्षिण का राजनीतिक समीकरण भाजपा की राजनीति के साथ एक बड़े बदलाव के लिए तैयार दिख रहा है। मूलत: भाजपा को उत्तर भारत की पार्टी कहा जाता रहा है और तमाम प्रयासों के बावजूद कर्नाटक को छोड़कर दक्षिणी राज्यों में यह अपनी पैठ नहीं बना सकी थी, मगर इस बार के चुनाव में चीजें बदल गई हैं। यह सही है कि पिछले आम चुनाव की तरह इस बार भी 29 सीटों पर भगवा झंडा लहरा पाया है, लेकिन इस बार उसे तमिलनाडु को छोड़कर बाकी सभी दक्षिणी राज्यों में सीटें मिली हैं, इसलिए उम्मीद यही है कि यह सिलसिला आगे और बढ़ेगा। इस साल पहली बार भाजपा ने केरल में भी सफलता हासिल की है, इसलिए यह कह सकते हैैं कि देवताओं की भूमि में भाजपा का खाता खोलना एक स्वर्णिम संकेत है। बेशक, कर्नाटक और तमिलनाडु में मन-मुताबिक प्रदर्शन नहीं हो पाया, लेकिन बाकी दक्षिणी राज्यों में भाजपा ने जो मेहनत की है, उसका असर दिख रहा है। दक्षिण में भाजपा का बढ़ता दबदबा पार्टी के लिए सुखद है। अब यह सही मायने में अखिल भारतीय पार्टी कहलाने की अधिकारी है। यह कह सकते हैं कि आने वाले समय में भाजपा के लिए दक्षिण में भी अपार संभावनाएं बनेंगी।
आरआर मनमोहन, टिप्पणीकार
जीत के सूत्रधार
तमिलनाडु में अन्नामलाई चुनाव हार गए। एक आईपीएस, जो नौकरी छोड़कर राजनीति में कूदा और भारत के दक्षिणी छोर पर हिंदुत्व की राजनीति का ध्वजवाहक बना, वह अपना चुनाव हार गया। मगर हारा कौन नहीं है? खुद दीनदयाल उपाध्याय अपना एकमात्र चुनाव हार गए थे। अपनी भाषण शैली के कारण जन-जन में लोकप्रिय अटल बिहारी वाजपेयी को भी पराजय झेलनी पड़ी थी। जो व्यक्ति किसी उद्देश्य के लिए जीता है, उसके लिए हार-जीत उसके मकसद का महज छोटा सा हिस्सा होता है। अन्नामलाई का मिशन है, तमिलनाडु में हिंदुत्व की राजनीति को स्थापित करना। हालांकि, पेरियारवाद के दलदल में कमल खिलाना थोड़ा कठिन कार्य लगता है, लेकिन इन चुनावों में राज्य के 11 प्रतिशत से अधिक वोट भाजपा को मिले हैं। जो लोग तमिलनाडु की राजनीति समझते हैं, वे जानते हैं कि यह कितनी बड़ी बात है। यह स्पष्ट है कि दक्षिण का किला दरक चुका है। देर-सबेर यहां भी भगवा ध्वज लहराएगा और इस मुहिम के नायक के रूप में अन्नामलाई याद किए जाएंगे।
विकल्प सिंह ठाकुर, टिप्पणीकार
उत्तर भारत जैसे नहीं हैं यहां के हालात
उत्तर और दक्षिण भारत में एक बुनियादी अंतर है। उत्तर भारत का समाज अब भी तरक्की के पायदान पर काफी पीछे है, इसी कारण वहां की राजनीतिक व्यवस्था भी गुणवत्तापूर्ण नहीं मानी जाती। इसके उलट, दक्षिण का समाज कहीं अधिक उन्नत है। यहां के लोग उत्तर भारतीयों की तुलना में कहीं अधिक जागरूक और संवेदनशील हैं। इसी कारण यहां की राजनीति भी उत्तर भारत से अलग है। यहां उस तरह जाति-धर्म की राजनीति नहीं होती, जिस तरह उत्तर भारत में होती है। यही मूल वजह है कि भगवा पार्टी को अपनी जगह बनाने में यहां इतना वक्त लगा। खैर, इससे इनकार नहीं है कि इस बार भाजपा का प्रदर्शन अच्छा रहा है और कुल 130 सीटों में से उसे 29 सीटें मिली हैं, जबकि पिछले आम चुनाव में उसे कर्नाटक से ही 25 सीटें मिली थीं और शेष चार सीटें तेलंगाना से मिली थीं। मगर इस बार तमिलनाडु छोड़ तमाम सूबों में मिली जीत के आधार पर यह नहीं कह सकते कि भाजपा दक्षिण भारत की भी पार्टी बन गई है, क्योंकि अब भी यहां क्षेत्रीय पार्टियों का खासा दबदबा है, जो जल्द खत्म होने वाला नहीं है।
आंकड़ों के मुताबिक, इस बार उसे आंध्र प्रदेश में तीन, तो तेलंगाना में आठ सीटें मिली हैं। केरल में उसका खाता खुला है। हालांकि, कर्नाटक में उसे 17 सीटेें जरूर मिली हैं, पर यहां से पिछली बार उसके 25 सांसद चुने गए थे। इस पर क्या कहेंगे आप? अगर भाजपा का असर वास्तव में होता, तो यहां की सीट वह नहीं गंवाती। तमिलनाडु में ही अन्नामलाई जैसे उसके कद्दावर नेता जीतने में सफल नहीं हो सके, जबकि पार्टी कार्यकर्ताओं की नजर में वह मुख्यमंत्री के चेहरों में एक हैं। इसी तरह, आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू का साथ यदि नहीं मिला होता, तो भाजपा के लिए अपना ग्राफ सुधारना मुश्किल होता। इन सबके उलट, उत्तर भारत में भारतीय जनता पार्टी अपने दम पर टिकी हुई है। जहां-जहां भी उसका गठबंधन है, वहां पर वह आमतौर पर बड़े भाई की भूमिका में है। 
कुल मिलाकर, हमें उत्तर और दक्षिण भारत की राजनीति का गहन विश्लेषण करते हुए किसी नतीजे पर पहुंचना चाहिए। सिर्फ एक चुनावी जीत से किसी के भाग्य का निर्धारण नहीं हो सकता। यदि समर्थकों की नजर में दक्षिण में पूर्ववत 29 सीटों पर ही रह जाना भाजपा की बड़ी सफलता है, तो राष्ट्रीय स्तर पर 303 सीटों से घटकर 240 पर आ जाना भाजपा की बड़ी हार मानी जानी चाहिए। कहने का अर्थ यही है कि भाजपा भले एक राष्ट्रीय पार्टी है, लेकिन दक्षिण का दुर्ग फिलहाल काफी मजबूत है।
कुणाल, टिप्पणीकार