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जूतों की रक्षा

वे लोग, जिनके लिए विवाह का मतलब कटोरी-प्लेट, दौना-पत्तल, रसमलाई-चमचम से अधिक नहीं था, जो बारात में नाचते-नाचते सीधे खाने के पंडाल में घुस जाते थे, बारात के द्वार पर पहुंचने के बाद कहीं दिखते नहीं थे, वे अब शादियों में देर तक रुकने लगे। अब वे शादी के सभी रीति-रिवाज देखना चाहते थे। मैं उस समय चकित रह गया, जब मेरे कजिन ने, जिसका विश्वास बारात में नाच-गा, खा-पीकर जनवासे में जल्दी पहुंचकर सबसे बढ़िया रजाई हथियाने में था, यह पूछा कि तू फेरे तक रुकेगा क्या? दादा के जूतों की रक्षा करनी है!

‘दादा के जूतों की रक्षा?’ मैंने उसे मेरे दोस्त किस्सा ये क्या हो गया वाली नजरों से देखा। यदि करवाचौथ को संपूर्ण भारत में लोकप्रिय बनाने का श्रेय यश चोपड़ा को जाता है, तो जूता चुराई नामक रस्म को भारतीय विवाह पद्धति का अनिवार्य अंग बनाने का श्रेय सूरज बड़जात्या को।... तो दादा के जूतों की रक्षा की इस रणनीति में हम क्या, संपूर्ण राष्ट्र सम्मलित हो गया। शादी की रात किसी छोटी-मोटी जंग की तैयारी की तरह होती। रणनीतियां बनतीं, दायित्व बांटे जाते, ड्यूटी लगाई जाती। उस रात वर-वधू पक्षों के लिए जूते किसी कोहिनूर से कम न होते। जूता चुराई में किसने कितना नेग दिया, इसके किस्से प्रचलित हो गए। हम आपके हैं कौन  एक कल्ट मूवी बन चुकी थी।

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  • Web Title:Hindustan Cyber Sansar Column August 10