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चुनाव जीतने वाले सभी सांसद बराबर

आम चुनाव के नतीजे आ चुके हैं और जिन दो परिणामों ने काफी ज्यादा चौंकाया है, उनमें से एक है, कश्मीर की बारामूला संसदीय सीट से अब्दुल राशिद शेख का जीतना और दूसरा, पंजाब की चर्चित लोकसभा सीट खडूर साहिब...

चुनाव जीतने वाले सभी सांसद बराबर
Monika Minalहिन्दुस्तानFri, 07 Jun 2024 09:34 PM
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आम चुनाव के नतीजे आ चुके हैं और जिन दो परिणामों ने काफी ज्यादा चौंकाया है, उनमें से एक है, कश्मीर की बारामूला संसदीय सीट से अब्दुल राशिद शेख का जीतना और दूसरा, पंजाब की चर्चित लोकसभा सीट खडूर साहिब से अमृतपाल सिंह की जीत। इन दोनों की राजनीतिक पारी से सियासी गलियारों में एक नई बहस शुरू हो गई है। राशिद शेख पेशे से एक इंजीनियर हैं, लेकिन उन पर ‘आतंकियों को धन मुहैया’ कराने का आरोप है। उनको साल 2019 में ही गिरफ्तार किया गया था और इस समय वह दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद हैं। उन्होंने कश्मीरी राजनीति के बड़े खिलाड़ी उमर अब्दुल्ला को दो लाख से अधिक वोटों से हराया है। उधर, अमृतपाल सिंह ने कांग्रेस उम्मीदवार कुलबीर सिंह जीरा को 1.97 लाख से भी अधिक मतों से शिकस्त दी। यह पंजाब की लोकसभा सीटों में किसी भी उम्मीदवार द्वारा दर्ज की गई जीत का सबसे बड़ा अंतर है। दोनों विजेता बतौर निर्दलीय मैदान में थे। 
सवाल है, अब सरकार क्या करेगी? क्या इनके निर्वाचन को रद्द घोषित किया जाएगा या फिर इनको शपथ लेने से रोका जाएगा? अगर इन्होंने शपथ ले भी ली, तो क्या संसदीय कार्यवाहियों में ये हिस्सा ले सकेंगे? इनको शपथ लेने से तो नहीं रोका जा सकता, लेकिन संसदीय कार्यवाहियों में शामिल होने पर रोक लगाई जा सकती है। हालांकि, बात चाहे शपथ ग्रहण की हो या संसद के कामकाज में हिस्सा लेने की, दोनों को अदालत की अनुमति के बाद ही जेल से बाहर आने की इजाजत मिलेगी। इस पूरे घटनाक्रम को इस नजरिये से भी देखा जा सकता है कि  जिसे हमारा पुलिस-प्रशासन अपराधी मानता है, उसे जनता के दरबार से क्लीन चिट मिली है। यह कहीं न कहीं हमारे लोकतंत्र की विडंबनाओं को भी उजागर करता है। वैसे, लोकतंत्र के मंदिर में जिस तरह से दागी प्रतिनिधियों की संख्या लगातार बढ़ रही है, उसको देखकर अमृतपाल या राशिद जैसे लोगों का संसद में पहुंचाना आश्चर्य पैदा नहीं करता। अगर अन्य अपराधों के आरोपी संसद की शोभा बन सकते हैं, तो ये क्यों नहीं? एडीआर की ही रिपोर्ट कहती है कि साल आपराधिक मामले घोषित करने वाले सांसदों की संख्या में साल 2009 से 55 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इस साल जीतने वाले 251 दागी उम्मीदवारों में से 170 पर हत्या, हत्या का प्रयास, बलात्कार, अपहरण और महिलाओं के खिलाफ अपराध सहित कई गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। अगर ये लोग संसदीय कार्यवाही में निर्बाध रूप से भाग ले सकते हैं, तो इंजीनियर राशिद और अमृतपाल को आखिर किस मुंह से रोका जा सकेगा?
जंग बहादुर सिंह, टिप्पणीकार

ऐसे प्रतिनिधियों पर संसद रोक लगाए
यह कैसा संविधान है हमारा? ऐसे लोगों पर कानूनन रोक क्यों नहीं है? जेल के भीतर रहते हुए भी ये लोग चुनाव कैसे लड़ लेते हैं? संविधान में ऐसे कट्टर लोगों को रोकने के लिए प्रावधान क्यों नहीं किए गए हैं? पंजाब की खडूर साहिब सीट पर कट्टरपंथी अमृतपाल सिंह ने जीत दर्ज की, जबकि जम्मू-कश्मीर की बारामूला सीट पर आतंकियों के वित्त-पोषक अब्दुल राशिद शेख को जीत मिली है। दोनों अभी जेल में बंद हैं, लेकिन सवाल यह कायम है कि सलाखों के पीछे रहने वाले ऐसे लोगों को जनता क्या सोचकर वोट देती है? क्या इनको संसद पहुंचाना सरकार के ही खर्चे पर देश तोड़ने वाली शक्तियों को प्रश्रय देना नहीं है? अगर अपराध हल्का-फुल्का होता, तो बात समझ में आ सकती थी, लेकिन यहां तो मामला अलगाववाद और आतंकवाद से जुड़ा है। ऐसे लोगों के साथ तो अपराधी सरीखा व्यवहार होना चाहिए, फिर चाहे अदालत में इन पर दोष साबित होने में वक्त क्यों न लग रहा हो! अच्छा अपराधी या बुरा अपराधी जैसी कोई संकल्पना नहीं होती, अपराधी सिर्फ अपराधी होता है और उसकी जगह सलाखों से पीछे है, न कि संसद में। 
मंजू चौधरी, टिप्पणीकार

देशहित के खिलाफ
केंद्र में भाजपा की सरकार हो या किसी भी अन्य दल की, यह सभी की जिम्मेदारी है कि वे ऐसा कोई कानून बनाएं कि आतंकी गतिविधियों में लिप्त रहने वाले या जिन पर लिप्तता की शंका भी हो, वे चुनाव प्रक्रिया का हिस्सा न बन सकें। इस काम में सभी जिम्मेदार सांसदों को सरकार का साथ देना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों और राष्ट्रदोहियों को संसद में प्रवेश न मिले। ये देश और समाज, सभी के लिए हानिकारक हो सकते हैं। यह विडंबना है कि जब किसी आम नागरिक पर कोई मुकदमा चलता है, तो वह सरकारी नौकरी के लिए अमान्य घोषित कर दिया जाता है, पर आपराधिक पृष्ठभूमि वाला नेता सरकार का हिस्सा बन सकता है। यह किस तरह की नीति है? जिस तरह आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नौजवानों को सरकारी नौकरी नहीं मिलती, ठीक इसी तरह ऐसे लोगों को भी संसदीय चुनावों से दूर रखना चाहिए। यह देश की भलाई, उन्नति, विकास आदि के लिए जरूरी है। कल्पना कीजिए कि आज अमृतपाल या राशिद जैसे एकाध लोग ही संसद में जीत कर आ रहे हैं, अगर इनको अभी नहीं रोका गया, तो आने वाले वर्षों में कई अमरजीत और राशिद लोकसभा की शोभा बढ़ा रहे होंगे। इसलिए इस प्रवृत्ति पर जल्दी अंकुश लगे।
कुमार राजेंद्र, टिप्पणीकार

 

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