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यह साहित्य में घोटाला नहीं तो और क्या

साहित्य अकादेमी ने युवा पुरस्कारों की घोषणा की है। हिंदी में पुरस्कृत लेखक गौरव पाण्डेय को अनंत बधाई और शुभकामनाएं! मगर साहित्य अकादेमी ने इस पुरस्कार की घोषणा के साथ जिन 12 अन्य लेखकों के नाम...

यह साहित्य में घोटाला नहीं तो और क्या
Monika Minalहिन्दुस्तानMon, 17 Jun 2024 09:13 PM
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साहित्य अकादमी ने युवा पुरस्कारों की घोषणा की है। हिंदी में पुरस्कृत लेखक गौरव पाण्डेय को अनंत बधाई और शुभकामनाएं! मगर साहित्य अकादेमी ने इस पुरस्कार की घोषणा के साथ जिन 12 अन्य लेखकों के नाम प्रकाशित किए हैं, उनमें से दो की पुस्तक आवेदन-तिथि के बाद आई है, जो 31 अगस्त, 2023 थी। इन दो लेखकों में पहले हैं, शहादत और दूसरे, विहाग वैभव। शहादत की पुस्तक कफ्र्यू की रात  लोकभारती प्रकाशन से 2024 में प्रकाशित हुई, यानी आवेदन की अंतिम तिथि के पांच महीने के बाद। जबकि, विहाग वैभव की पुस्तक राजकमल प्रकाशन से सितंबर, 2023 में प्रकाशित हुई, यानी आवेदन की अंतिम तिथि के एक महीने बाद। ऐसी स्थिति में साहित्य अकादेमी ने इन दोनों लेखकों की पुस्तकों पर विचार कैसे किया? इन दोनों पुस्तकों का नाम अंतिम सूची में कैसे है? 
इतना ही नहीं, पुरस्कृत लेखक गौरव पाण्डेय की पुस्तक भी 30 अगस्त, 2023 को प्रकाशित हुई, यानी अंतिम तिथि से ठीक एक दिन पहले। सवाल है, एक दिन में लेखक महोदय ने स्वयं किस तरह पुस्तक को प्रकाशक से लेकर साहित्य अकादेमी के कार्यालय तक पहुंचा दिया, क्योंकि साहित्य अकादेमी की प्रेस विज्ञप्ति में साफ-साफ लिखा है कि आवेदक को पुस्तक की दो प्रतियां स्वयं प्रमाणित जन्म प्रमाणपत्र के साथ जमा करानी होंगी। अब यह भी कहा जा रहा है कि नियमों में इस पुरस्कार के लिए उम्र की बाध्यता होती है, प्रकाशन वर्ष की नहीं, पर मेरा सवाल यह है कि प्रेस विज्ञप्ति में अंतिम तिथि क्यों दी जाती है? इसका क्या औचित्य है? अगर यह नियम सही है, तो साहित्य अकादेमी की प्रेस विज्ञप्ति गलत है, क्योंकि उसमें बताए गए नियम के मुताबिक, अंतिम तिथि के बाद आवेदन स्वीकार नहीं किया जाएगा। और, अगर प्रेस विज्ञप्ति सही है, तो यह नियम गलत है। दोनों ही अवस्थाओं में गलती कहीं न कहीं साहित्य अकादेमी की ही दिख रही है।
जाहिर है, इस बार का साहित्य अकादेमी युवा पुरस्कार नीट के नतीजों की तरह जाली व संदेहास्पद प्रतीत हो रहा है। इससे बड़ी साहित्यिक चोरी और क्या हो सकती है? क्या इन्हीं अनैतिक मूल्यों के साथ आज का युवा और उसका साहित्य टिका हुआ है? साहित्य को धंधा बना दिया गया है, जो बहुत ही शर्म की बात है। आखिर हो क्या रहा है? यह समर्थ युवा लेखकों के साथ ज्यादती है। इसलिए, साहित्य अकादेमी से अनुरोध है कि इस पर गौर फरमाया जाए और तुरंत कार्रवाई करते हुए युवा पुरस्कार, 2024 की घोषणा वापस ली जाए और नए सिरे से पुरस्कारों की घोषणा की जाए! 
कुमार सुशांत, टिप्पणीकार
नियमों के तहत चुनी गई पुरस्कृत किताबें
साहित्य अकादेमी पुरस्कारों पर जो लोग सवाल उठा रहे हैं, उन्हें संभवत: नियमों की पूरी जानकारी नहीं है। यह तो भला हो सोशल मीडिया का कि ये नियम भी अब जगजाहिर हैं। दरअसल, अकादेमी ने युवा पुरस्कारों के लिए जो नियम तय किए हैं, उसमें प्रकाशन वर्ष की कोई बाध्यता नहीं है। इसका अर्थ है कि किताबें अंतिम तिथि से पहले प्रकाशित हुईं या बाद में, यह कोई बहस का विषय ही नहीं है। बल्कि, केवल यह देखा जाता है कि तय तिथि को पुस्तक के लेखक की उम्र 35 वर्ष से अधिक न हो। इतना ही नहीं, पुरस्कृत किताबों के चयन के लिए चार स्तरीय प्रक्रिया अपनाई जाती है। प्रथम चरण में लेखकों अथवा प्रकाशकों से एक निर्धारित तिथि के भीतर प्रविष्टियां जमा करने को कहा जाता है, जिसके मुताबिक पुस्तकों की आधार सूची तैयार की जाती है। इसके बाद संबंधित भाषा के परामर्श मंडल के सदस्यों को यह आधार सूची भेजी जाती है और उनकी अनुशंसाएं मांगी जाती हैं। तीसरे चरण में, दस सदस्यीय एक अन्य पैनल को दूसरे चरण की अनुशंसा-सूची भेजी जाती है और उस पर उनकी राय मांगी जाती हैं। इस चरण में तैयार सूची के पुस्तकों पर जूरी के सदस्य विचार करते हैं और पुरस्कार के लिए बहुमत या एकमत से किसी पुस्तक का चयन करते हैं। असल में होता यह है कि दूसरे या तीसरे चरण की समितियों के सदस्य अपनी अनुशंसा भेजने की तिथि तक प्रकाशित पुस्तकों को अपनी अनुशंसा में शामिल करने के लिए स्वतंत्र होते हैं। जूरी द्वारा अनुशंसित पुस्तक अथवा लेखक को पुरस्कार दिए जाने की घोषणा अकादेमी के कार्यकारी मंडल के अनुमोदन के बाद ही की जाती है। 
दिक्कत यह है कि कई लोग अनुशंसा और आवेदन के फर्क को नहीं समझ पा रहे। आवेदन और अनुशंसा दोनों ही इस पुरस्कार निर्धारण प्रक्रिया के अंग हैं। जिस तरह आवेदन की अंतिम तिथि निर्धारित की जाती है, उसी प्रकार दूसरे और तीसरे चरण की समितियों के सदस्यों के लिए अनुशंसा की तिथि भी निर्धारित रहती है। आवेदन की अंतिम तिथि लेखक अथवा प्रकाशकों के लिए है, अनुशंसकों के लिए नहीं और वह पुस्तकों के प्रकाशन का कोई सीमांकन भी नहीं है। यह असल में, लेखकों के स्वाभिमान से भी जुड़ा मसला होता है, क्योंकि अपने नाम का आवेदन करने से कई लेखक हिचकते हैं, इसलिए उन लेखकों के लिए, जिनकी रचनाएं कसौटी के मानदंड पर खरी उतर रही होती हैं, अनुशंसा की व्यवस्था दुनिया भर में दिखती है। साहित्य अकादेमी ने भी यदि इस व्यवस्था को अपनाया हुआ है, तो इसमें गलत क्या है? 
प्रतिमा कुमारी, टिप्पणीकार