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नौकरशाही बनाम लोक

यह बात स्वतंत्रता के तुरंत बाद की है। नौकरशाही ने नेहरूजी को नजरकैद कर लेने की तैयारी कर ली थी, ताकि उनका सामान्य जनता से संबंध न्यूनतम रह जाए। शिवदत्त उपाध्याय मोतीलाल नेहरू के सहायक थे। उनके निधन के बाद वह जवाहरलाल नेहरू के सचिव हो गए। घर-परिवारी हो गए थे। आजादी के बाद सरकारी सेक्रेटरी भी आ गया। उसे यह बुरा लगता कि उपाध्याय हर किसी को पीएम से मिलवा देता है। उसने उपाध्यायजी से कहा, आप सरकारी सेवा में आ जाओ, वेतन भी ज्यादा मिलेगा और पंडितजी पर इसका बोझ भी नहीं रहेगा।

उपाध्यायजी ने ध्यान नहीं दिया। सरकारी सेक्रेटरी ने कई प्रयास किए। अंतत: इंदिराजी को आनंद भवन की चिंता का हवाला देकर उसने उपाध्यायजी को आनंद भवन की देखरेख के लिए इलाहाबाद भिजवा दिया। पीएम दफ्तर में सेक्रेटरी का निष्कंटक राज हो गया। बाबू श्रीप्रकाशजी पंडितजी के घनिष्ठ सहपाठी थे। वह आए, तो सेक्रेटरी ने बहुत से सवाल किए, इंतजार कराया। श्रीप्रकाशजी भड़क गए। उनकी गर्जना सुन नेहरू स्वयं निकल आए। श्रीप्रकाशजी ने पंडितजी से कहा, यहां एक भी आदमी नहीं रखा, सारे अफसर हैं? पंडितजी ने उपाध्यायजी को बुलाकर कहा, तुम्हारी जरूरत यहां है। लोग जवाहर से मिलने आते हैं। नेहरू लोक की ताकत को समझते थे।

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  • Web Title:Hindustan Cyber Sansar august 14th