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आरक्षण का दांव

गरीब सवर्णों को सरकार जो 10 फीसदी आरक्षण देने की तैयारी कर रही है, उसके लिए उसे मौजूदा 50 प्रतिशत की सीमा से बाहर रखा जाएगा और इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में संशोधन करना पड़ेगा। जहां तक संसद का सवाल है, तो बीजेपी को  राजनीतिक तौर पर ज्यादा विरोध का सामना नहीं करना पड़ेगा। कांग्रेस ने इसका समर्थन किया है, लेकिन यह सवाल भी पूछा है कि आखिर गरीबों को नौकरियां कब मिलेंगी? अन्य राजनीतिक दल भी सीधे तौर पर सरकार के इस कदम का विरोध तो नहीं कर पाएंगे, लेकिन उनकी कोशिश होगी कि यह फिलहाल अमल में न आ पाए, ताकि सरकार इसका श्रेय न ल सके। फिर यदि संसद में यह पारित भी हो गया, तो इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती मिलना तय है। आरक्षण देश में हमेशा से एक संवेदनशील राजनीतिक मुद्दा रहा है, खासकर 1991 में मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होने के बाद से। गरीब सवर्णों को आरक्षण देने की मांग भी अक्सर उठती रहती है और कई बार इसके प्रयास हुए भी हैं। पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने अपने कार्यकाल में मंडल आयोग की रिपोर्ट के प्रावधानों को लागू करते हुए अगड़ी जातियों के लिए 10 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की थी, मगर सुप्रीम कोर्ट की सांविधानिक पीठ ने इसे खारिज कर दिया था।

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  • Web Title:cyber world article on hindustan on 9 january