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वसंत के बाद बहार

 

वसंत का अर्थ उल्लास ही नहीं है, उसमें एक ‘ट्रांजिशन-फेज’ या ‘लेट्स मूव ऑन’ वाली बात भी है। शीत की अंधियारी के खत्म होने और क्षितिज पर मद्धम प्रकाश के आने की। इसमें उछलने-कूदने की बात नहीं, यह गंभीर है। जब रोशनआरा बेगम से पूछा गया कि आप वसंत गाती हैं, तो लगता है कि आप रो रही हैं। वसंत का उन्माद नहीं दिखता। उन्होंने कहा कि यह तो मालूम नहीं, लेकिन अगर ऐसा लगता है, तो वसंत ऐसा ही होगा। जब अब्दुल करीम खान की फगवा बृज देखन को चल री पहली बार ढंग से सुना, तो मुझे भी लगा कि इसमें जोश कहां है? यह तो गंभीर कर देने वाला राग है कि बस शून्य में देखते कुछ नॉस्टैल्जिक हो जाओ।
वसंत की फिल्मी व्याख्या पर न जाइए। वहां जो आप देख रहे हैं, वह बहार है। रागों में वसंत और बहार अलग है (और ऋतु में भी)। एक में वेदना, तो दूजे में उल्लास है। फूल तो खिल गए, लेकिन पिया नहीं आए। यह मूड है वसंत का। जब पिया आएंगे, तब बहार आएगी। तो यह जो ‘वेटिंग टाइम’ है, वही वसंत है। इसमें कन्फ्यूजन न रखें। यह प्राकृतिक भी नहीं कि अंधेरा खत्म हुआ और आप कूदने लगे। पहले अंगड़ाई लें, पिछली रात का फसाना कुछ याद करें, आंखें बंद कर चिंतन करें, तो वसंत का रस पकड़ में आएगा। ‘स्मूथ ट्रांजिशन।’

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  • Web Title:cyber sansar Hindustan column on 9 february