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विज्ञान बनाम आस्था

लखनऊ में ओले गिरे हैं।... हस्तिनापुर के कुरु कुमार टेस्ट-ट्यूब संतति थे। टेस्ट-ट्यूब संतति से आप क्या समझते हैं? यह कि अंडाणु और शुक्राणु कांच के मर्तबान में मिलेंगे और भ्रूण बन वहीं पनपेंगे, फिर नौ महीने में शिशु विकसित हो जाएगा? अगर ऐसा है, तो कोई आश्चर्य नहीं कि हमारे देश में आम जन की वैज्ञानिक चेतना को रोज भ्रम की इच्छाधारी नागिन क्यों डसती है?
आधुनिक प्रसूति-विज्ञान स्त्री देह से बाहर सिर्फ अंडाणु और शुक्राणु का मिलन कराकर भ्रूण का प्रारंभिक विकास कराता है (इन विट्रो)। बस। यह भ्रूण कुछ कोशिकाओं का गुच्छा बना नहीं कि इसे गर्भाशय की जरूरत पड़ी (इन वीवो?)। यानी टेस्ट-ट्यूब में किसी बच्चे को नौ महीने तक विकसित नहीं किया जाता। बाकी महाभारत  में जिन्हें अक्षरश: विज्ञान दिखता है, वे तो यह तक कह सकते हैं कि सौ धृतराष्ट्र-पुत्रों और पुत्री दु:शला को गांधारी को गर्भ में रखने की जरूरत ही नहीं पड़ी। एक साथ उनके सौ अंडाणु निकले और निषेचित हो गए। बता दूं कि किसी स्त्री से एकाधिक अंडाणु अंडाशय से रिलीज कराने और उन्हें जमा करने के लिए गायनेकोलॉजिस्ट विशेष दवाओं और खास तकनीक का प्रयोग करते हैं। पर आस्था का सबसे बड़ा गुण यह है कि वह ज्ञानसम्मत क्रम नहीं समझती, फंतासी को ही सत्य मान लेती है। 
  

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  • Web Title:cyber sansar Hindustan column on 8 january