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स्त्री-मुक्ति का पर्व  

दिवाली की पृष्ठभूमि में एक पौराणिक कथा है कि प्राग्ज्योतिषपुर के असुर सम्राट नरकासुर ने देवराज इंद्र को पराजित करने के बाद देवताओं और ऋषियों की सोलह हजार से ज्यादा कन्याओं का अपहरण कर उन्हें अपने रनिवास में रख लिया। नरकासुर को किसी देवता या पुरुष से अजेय होने का वर प्राप्त था। उसके आतंक से त्रस्त देवताओं ने श्रीकृष्ण से याचना की। देवताओं की दुर्दशा और श्रीकृष्ण की चिंता देखकर कृष्ण की एक पत्नी सत्यभामा सामने आईं। उनके पास कई युद्धों में भाग लेने का अनुभव था। श्रीकृष्ण को सारथि बनाकर सत्यभामा युद्ध में उतरीं और नरकासुर का वध कर दिया। सभी ्त्रिरयों को मुक्त करा लिया गया। सत्यभामा और श्रीकृष्ण के द्वारका लौटने पर घर-घर दीये जलाकर ्त्रिरयों की मुक्ति का विराट उत्सव मनाया गया। एक कथा यह भी है कि नरकासुर के रनिवास में लंबे समय तक रहीं इन औरतों को सामाजिक निंदा के भय से उनके घरवालों ने जब अपनाने से इनकार कर दिया या औरतें तिरस्कार के भय से स्वयं घर जाने को तैयार न हुईं, तो श्रीकृष्ण ने उन्हें सामाजिक सम्मान दिलाने के लिए पत्नी का दर्जा दिया। दिवाली का दिन खुद से यह सवाल पूछने का अवसर भी है कि क्या ्त्रिरयों को पुरुष-वासना और अहंकार जैसे नरकासुरों की कैद से मुक्ति दिला पाए हैं हम?
  
 

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  • Web Title:cyber sansar hindustan column on 7th november