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हड़ताल पर किसान

हड़ताल से किसान भारी नुकसान उठा रहे हैं। दूध विक्रेताओं और डेयरी किसानों को तो हड़ताल के पहले तीन दिन में ही दो से ढाई करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। जाहिर है, किसान डटे हुए हैं, टूटे नहीं हैं, लेकिन वे मरते दम तक यूं ही खड़े रहेंगे- यह कहना सच्चाई की अनदेखी करना होगा। ऐसे वक्त में, जहां समर्थन और विरोध में पहले नफा-नुकसान देख लिया जाता हो, इस स्वत:स्फूर्त आंदोलन की दीर्घजीविता के बारे में क्या सोचना या कहना? हो सकता है कि वे हार मान लें या कुछ समझौते पर राजी हो जाएं या हताश लौट जाएंं। लेकिन नैतिक तौर पर प्रखर और पॉलिटिकली मजबूत समुदाय के रूप में उन्होंने अपने निशान तो छोड़ ही दिए हैं। दरअसल, दूर फलक पर देखा जाए, तो यह इस देश में कृषि बनाम कॉरपोरेट की दूरगामी लड़ाई भी है। कॉरपोरेटपरस्त सरकारें, सरकारी अमला, सारे सरकारी बुद्धिजीवी, अर्थशास्त्री और विशाल जबडे़ वाला निजी क्षेत्र एक तरफ हैं और ये किसान दूसरी तरफ। अगर आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ियों को कृषि विहीन और कृषक विहीन देश चाहिए, तो फिर किस्सा यहीं खत्म समझिए। पर आंदोलन व प्रतिरोध की आवाजें ऐसे यथास्थितिवाद के सामने खनकती रहती हैं। किसानों की ताजा हड़ताल भी यही बताती है।

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  • Web Title:cyber sansar hindustan column on 7 june