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झूठ परोसने वाले

 

 


जब वे आपसे झूठ कहें, तो उनसे नाराज न हों। वे आपके भाई-बंद हैं, आपके जैसे ही झूठ के पुतले! उनकी आंखों में झांककर देखें और एक अदृश्य मुस्कराहट मुस्कराएं, ताकि उन्हें खबर न हो कि आपको उन पर ऐतबार नहीं। वे जो कह रहे हैं, उस पर यकीन न करें, पर वे वैसा क्यों कह रहे हैं, इसे समझें। जब खुदा ने इंसान को जमीन पर भेजा, तो उसके साथ कोई वकील नहीं भेजा। हर किसी को अपनी पैरवी खुद करनी होती है, नहीं तो आईने में शक्ल देखना दूभर। झूठ, आधा सच, मिली-जुली हकीकतें, दोहरे अर्थों वाले वाक्य और गढ़े गए वहम- ये वे औजार हैं, जिनकी मदद से इंसान अपनी जिंदगी बिताता है। क्योंकि केवल जिंदा रहना उसका हासिल नहीं, वह जैसे जी रहा है, वैसे क्यों जी रहा है, इसका बयान दुनिया के सामने रखना भी उसकी हस्ती के लिए जरूरी है। और वह सच सच बोल देगा, तो कैसे जीएगा? दुनिया की नींव में ही झूठ का मलबा है। सच चाहे जितना बड़ा हो, दुनिया से बड़ा नहीं हो सकता। आदमी को दुनिया-जहान की चीजें चाहिए, एक निरी सच्चाई नहीं चाहिए। और यह दुनिया आपके बाहर नहीं है। शर्म से लाल चेहरा लेकर जीते रहने की वकअत आदमी में नहीं, झूठ के कारोबार में उसे हाथ लगाना ही होगा। और लौटकर करना होगा अपना निर्लज्ज बचाव। 

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  • Web Title:cyber sansar Hindustan column on 7 february