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ईशनिंदा और पाकिस्तान

पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने ईशनिंदा के आरोपों में मौत की सजा पाने वाली आसिया बीबी को बरी कर ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान ऐसे फैसलों के लिए तैयार है? कट्टरपंथियों को यह बात हजम नहीं हो रही है कि ईशनिंदा के इल्जाम में मौत की सजा पाने वाली एक ईसाई महिला को कैसे बरी किया जा सकता है? वह भी तब, जब 2010 से चल रहे इस मामले में लाहौर हाई कोर्ट तक मौत की सजा पर मुहर लगा चुका था। पर देश की सबसे बड़ी अदालत ने मामले को पलट दिया और इस बारे में पेश सुबूतों को नाकाफी बताकर मामला खारिज कर दिया। कट्टरपंथी इसके विरोध में सड़कों पर उतर आए हैं और धमकी दे रहे हैं कि जब तक आसिया को फांसी पर नहीं चढ़ाया जाएगा, वे सड़कों से नहीं हटेंगे। आर्थिक संकट के मोर्चे पर जूझ रहे प्रधानमंत्री इमरान खान के लिए आसिया की रिहाई एक और बड़ी चुनौती है। 
आसिया बीबी के मामले में फैसला सुनाते हुए चीफ जस्टिस साकिब निसार ने कुरान  का हवाला दिया और कहा कि सहिष्णुता इस्लाम का बुनियादी सिद्धांत है। मगर कट्टरपंथियों के लिए धर्म की अपनी व्याख्या है। इस फैसले को वे अपने अस्तित्व के लिए खतरा समझ रहे हैं, जबकि दुनिया के लिए यह ‘इंसाफ की नजीर’ है।

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  • Web Title:cyber sansar Hindustan column on 6 november