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करेले और बचपन

करेले का कड़वापन एक मिथ है। हमारे बचपन का वह हरा जहर, वह दुश्मन फल, आज वह एक मामूली, बेजरर (जिससे कोई नुकसान पहुंंचे) सब्जी बनकर रह गया है। प्याज के साथ इसे पकाओ, तो प्याज ही उसके सीने पे चढ़ी मालूम होती है।
बचपन में जिस रोज करेला हमारे घर में बनता, मैं बहाने से भागकर किसी खाला, मुमानी, चाची या ताई के घर चला जाता था। काफी देर तक मुझे वहां मंडराता देखकर कोई पूछतीं- मुन्ने, खाने का वकत हो गया, तुमको भूख नहीं लगी? घर नहीं जाएगा? मुझे झेंप से दबा देखकर फिर वह बोलतीं- कुछ शरारत करके आया है क्या? मैं सिर हिलाकर मना करता। फिर वह पूछतीं- अच्छा ये तो बता, आज तेरे यहां क्या पका है? मैं झट से कह उठता- करेले!
वह कहतीं- हाय! करेले!... अरी छोरी.... ओ नसीमा... जाके बड़ी अम्मा से कह आ, सुना है कि तुम्हारे यहां करेले पके हैं। कुछ करेले मेरे लिए बचाके रखियो। शाम को वकत मिला, तो जरूर आऊंगी। और हां, कह आना आज मुन्ना मेरे पास है। उसे यहीं पर  खाना खिला दूंगी।
उन कड़वे करेलों की तरह बचपन भी अब एक मिथ ही है।

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  • Web Title:cyber sansar Hindustan column on 6 august