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मेरा घर, मेरे भीतर 

रात से मुसलसल बारिश हो रही है। मैं अब शहर के पक्के मकान में हूं। बारिश न हो, तो लगता है कि खेत सूखे होंगे और बारिश होती है, तो अकबकाकर सोते से जाग जाता हूं। मुझे लगता है कि मेरा घर भीग रहा होगा। वही घर, जिसकी छतें एक कुनबे नहीं, मोहल्ले को जोड़ देती थीं। इधर पूरन के घर से उधर गोमिद के घर तक। इधर जामुन के गुच्छे लटकते, तो उधर बेर। इन छतों पर टहलने के बहाने थे।

इतनी ही बारिश में एक रात तीन दरों वाली तिदरी की कच्ची छत का एक हिस्सा टूटकर गिरा, तो पिता सबसे पहले हड़बड़ाकर उठ खड़े हुए थे। दिन में उन्होंने छत की इस कमजोर जगह को पन्नी से ढक दिया था। फिर भी उसे गिरना ही था। घर बचाने में उनका एक जीवन      लग गया...

जिंदगी अदद घर की तलाश ही तो है। वह घर अभी जिंदा है। मैं उसे मार नहीं पाता। वह बहुत दुखता है। बारिशों में चूने लगता है। मैं उसका रोना जान लेता हूं और उसमें अपना रोना मिला देता हूं। बार-बार सोचता हूं कि अबकी बारिश आएगी, तो इसे गिर जाने देंगे। फिर अचानक इसकी दरारों को भरने लगता हूं। सीलन ज्यादा है। छत संभाल देते हैं। यह बारिश भी बीत जाने दें। जैसे भी हो, मेरे अंदर घर बचा रहे।
  

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  • Web Title:cyber sansar hindustan column on 29 august