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जाति बनाम वर्ग

इस आरोप में दम है कि वाम नेतृत्व में गैर-सवर्ण जातियों का प्रतिनिधित्व कम रहा है, हालांकि बिहार की राजनीति को जानने वाले रामाश्रय यादव को भी जानते हैं, जो कई बार जहानाबाद से सीपीआई के विधायक रहे। फिर भी, समग्रता में देखें, तो इस आरोप में दम है। लेकिन कास्ट (जाति) के साथ एक चीज ‘क्लास’ (वर्ग) भी है। क्लास भी एक तल्ख सच्चाई है। अगर इस नजरिए से देखें, तो सामाजिक न्याय वाली पार्टियों के नए उभरते नेतृत्व का अधिकांश हिस्सा मुख्यमंत्री और कैबिनेट मंत्रियों के आवास से ही निकलकर आ रहा है। वहां 3,000 रुपये मासिक वेतन पाने वाले के बेटे के लिए आगे बढ़ने के रास्ते सिकुड़ते जा रहे हैं। ध्यान रहे, मैंने ‘नेतृत्व का अधिकांश हिस्सा’ कहा, कुछ नाम वहां भी होंगे, जैसे मित्रसेन यादव और रामाश्रय यादव जैसे नाम इधर भी हैं। तनवीर हसन के मामले में आज चार लाख वोट का हवाला दिया जा रहा है। मगर यही तर्क रामकृपाल यादव ने 2014 में दिया था, तब उनके तर्क को नहीं स्वीकार किया गया था, जबकि वह वर्तमान सांसद थे।
बहरहाल, इन कमियों को स्वीकार करते हुए, इन्हें यथासंभव दुरुस्त करते हुए इस समय मिलकर चलना चाहिए। न तो यह सामान्य समय है, और न ही यह चुनाव लोकतांत्रिक भारत का रूटीन चुनाव है।

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  • Web Title:cyber sansar Hindustan column on 27 march