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कहां है महिला आरक्षण

संसद व विधानमंडलों में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देकर शायद कोई भी राजनीतिक दल अपने पैरों पर कुल्हाड़ी नहीं मारना चाहता। पितृ-सत्तात्मक संरचना वाले समाज में घर हो या दफ्तर, सड़क हो या संसद, महिलाओं के लिए स्पेस को कमतर करते रहने की मंशा में कैसी हैरानी? अफसोस जरूर होता हैै। स्त्रियों के विकास से ही घर-परिवार, समाज और देश का विकास सुनिश्चित किया जा सकता है- ये नारेनुमा तोतारटंत बातें इतने लंबे समय से आखिरकार कैसे चल पा रही हैं और उन्हें सुना भी जा रहा है, तालियां भी बज रही हैं और वोट भी पड़ रहे हैं? सत्ताएं आ रही हैं और जा रही हैं। लेकिन महिला-हितों को लेकर कोई ठोस ऐक्शन नदारद है, जबकि संसद से ही इसकी शुरुआत होती, तो सोचिए कि यह देश के लिए कितना बड़ा संदेश होता? महिला सशक्तीकरण की दिशा में एक बड़ी राह खुलती। महिलाओं के प्रति समाज के मर्दवादी रवैये और उनके खिलाफ अपराधों का ग्राफ नीचे आता। जब विधायिका ही उदासीन है, तो फिर हालात कैसे बदलेंगे?1996 में एचडी देवेगौड़ा के प्रधानमंत्री काल में पहली बार महिला आरक्षण विधेयक  पेश किया गया था।... 2018 में महिला आरक्षण बिल पर फिर से चिट्ठी-पत्री का खेल चल रहा है, पर सियासी दल और सरकार रहस्यपूर्ण खामोशी ओढ़े हुए हैं।

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  • Web Title:cyber sansar Hindustan column on 27 july