DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

यूपी में पेच कई 

 

 

राजनीति में कुछ भी मुमकिन है। नामांकन भरने की आखिरी तारीख तक गठबंधन बनेंगे और बदलेंगे, लेकिन अभी हम यह मान लेते हैं कि उत्तर प्रदेश में खेमेबंदी पूरी हो चुकी है। सपा-बसपा और रालोद का गठबंधन ही अंतिम है और इसमें कांग्रेस को जगह नहीं मिलेगी। कांग्रेस को अकेले दम पर चुनाव लड़ना है और उसे छोटे-छोटे स्थानीय दलों-नेताओं को जोड़कर ही अपनी ताकत बढ़ानी होगी। अगर यही अंतिम सच है, तो फिर यह मूल्यांकन जरूरी है कि मायावती-अखिलेश के फैसले से फायदे में कौन है और घाटा किसे होगा? बहुत से धुरंधरों की राय है कि सूबे में कांग्रेस का कोई वजूद नहीं है, वहां मायावती और अखिलेश की आंधी में बीजेपी साफ हो जाएगी। उनके मुताबिक अलग चुनाव लड़ने पर कांग्रेस सवर्णों के ही वोट काटेगी, इससे सपा-बसपा-रालोद को फायदा पहुंचेगा। उनका यह भी मानना है कि दलितों, मुसलमानों और पिछड़ों को जोड़ने वाले किसी भी गठबंधन को हराना मुमकिन नहीं, लेकिन यह तथ्य भी उतना ही सही है कि जमीनी स्तर पर हितों का टकराव बहुत ज्यादा है। बहुत जगहों पर दलितों और मुसलमानों के बीच, दलितों और पिछड़ों के बीच, पिछड़ों और मुसलमानों के बीच संघर्ष है। इसलिए कागज पर जोड़ने से दिल बहलाने के आंकडे़ तो मिल जाते हैं, पर नतीजे नहीं मिलते। 
    

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:cyber sansar Hindustan column on 26 march