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गांधी को पहले जान तो लो

तब वाट्सएप और फेसबुक का जमाना नहीं था, फिर भी जाने कैसे कुछ जहर हवाओं में घुले ही रहते थे। शर्मिंदगी होती है यह सोचकर कि गांधीजी की हत्या को जायज ठहराने को लेकर जो कुछ आज कहा जा रहा है, वही सब कुछ मैंने 2001 की एक दोपहर पूरी क्लास के आगे कहा था...सबने सुना समर्थन किया। एक शख्स उठा और उसने मुझसे पूछा, नोटों पर छपे गांधीजी के अलावा तुम उनके बारे में और क्या पढ़ी हो, क्या जानती हो उनके बारे में? मैं खामोश... सब खामोश। उसने बहुत शांति से, तर्क सहित तत्कालीन देश-काल-परिस्थिति और गांधीजी को समझाया। उसने अगले ही दिन मुझे गांधीजी की आत्मकथा पढ़ने को दिया, और तब से किताबों को सुझाने का सिलसिला आज तक चलता आ रहा है।
तब हम सबकी उम्र 21-22 ही थी। हमारे अपरिपक्व जेहन में जो बिठा दिया जाता है, वही सही लगता है। हम तथ्यों का विश्लेषण नहीं कर पाते या यूं कहें कि दो मिनट की मैगी के सामने दाल-रोटी पकाने का झंझट कौन पाले? बीते वर्षों में गांधी दर्शन को जितना पढ़ सकती थी, मैंने पढ़ा... साबरमती आश्रम भी गई... जितना ही इस बूढ़े को पढ़ती हूं, उतना ही विस्मय बढ़ता जाता है। कुछेक असहमतियों के बावजूद यह कहने में कतई कोई गुरेज नहीं कि वह सचमुच महामानव थे। 

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  • Web Title:cyber sansar Hindustan column on 23 may