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रागों की राजनीति

रागों की भी अपनी राजनीति है। कोई राग सिंहासन पर बैठा है, तो कोई जमीन पर है। कोई राग अभिजात्य, कोई सर्वहारा। मेरे प्रिय राग झिंझोटी को भी संगीत अध्येता क्षुद्र राग ही कहते हैं। पहाड़ी, झिंझोटी और खमाज पहले ऊंचे घराने के लोग खयाल में भी नहीं गाते थे। गाया भी, तो आलाप लेकर विलंबित खयाल में नहीं गाया। ये राज-दरबारों के उस्तादों की पसंद नहीं, लोक धुनों या तवायफ के कोठों में सिमटे रहे। खमाज में गजल, ठुमरी, टप्पे या जनता भजन बनेंगे; उस्ताद गलती से गाएंगे भी, तो इसका किसी अभिजात्य राग से विवाह कराकर परिष्कृत बनाएंगे, मिश्र या मंज खमाज बनाएंगे, फिर गाएंगे। लेकिन एक बात है। जो खूबसूरती, जो चंचलता, जो रोमांस खमाज में है, वह किसी और में नहीं। बल्कि मेरा तो यह मानना है कि ऊंचे घराने के लोग भी छिपकर खमाज जरूर गाते होंगे। इसकी पहचान पुरानी है, और यह दक्खिन में भी खमास नाम से गाया जाता रहा है। लोक धुनों में तो यह सदा से रहा है।
ऐसा हो ही नहीं सकता कि कोई देश में रहा हो, और खमाज की धुन कभी उसके कानों में न पड़ी हो। यह तो देश के मूड का राग है। (राग देस खमाज के निकट है) और सच तो यह है कि अब संगीत में भी समाजवाद आ गया। क्षुद्र क्या होता है? अब गुंडेचा बंधु जैसे ध्रुपदिए भी खमाज गाते हैं।

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  • Web Title:cyber sansar Hindustan column on 20 april