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मजबूर या मजबूत सरकार

राजनीतिक हो-हल्ले में कई बार अर्थव्यवस्था से जुड़ी बातें दब सी जाती हैं, जबकि सबसे बड़ा सच यही है कि अर्थव्यवस्था के विकास से कमोबेश देश की सारी समस्याओं का हल मिल सकता है। 
क्या यह सिर्फ संयोग है कि कम से कम पिछले 35 वर्षों में भारत में केंद्र की उन्हीं सरकारों ने अर्थव्यवस्था को बेहतर संभाला, जो गठबंधन सरकारें रहीं? लेकिन इस संयोग को कैसे भुलाया जाए कि अर्थव्यवस्था के अलावा देश को सामाजिक रूप से नया चेहरा देने वाले कई मजबूत कदम तथाकथित अस्थिर या गठबंधन सरकारों ने ही लिए हैं, फिर चाहे वह मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू करने का कदम हो या फिर न्यूनतम रोजगार गारंटी देने का फैसला। सूचना का अधिकार और शिक्षा का अधिकार जैसे कदम भी यूपीए की गठबंधन सरकार ने ही लागू किए थे। मोदी सरकार के खाते में सामाजिक रूप से महत्वपूर्ण अगड़ी जातियों को आरक्षण देने और मुस्लिम समुदाय में कहीं-कहीं प्रचलित ‘तीन तलाक’ की कुप्रथा पर प्रतिबंध लगाने के फैसले आते हैं। अब इन बातों से यह निष्कर्ष निकालना आपके जिम्मे है कि केंद्र की गठबंधन सरकार ‘मजबूर’ होती है या ‘मजबूत’; और क्या वाकई गठबंधन सरकारें देश की सेहत के लिए उतनी नुकसानदेह हैं, जैसा कि सत्ता पक्ष प्रचारित कर रहा है?

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