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जेट का हश्र क्या कहता है

हम नब्बे के दशक में युवा हुए लोग निजी बनाम सरकारी की बहस से दो-चार होते हुए बड़े हुए हैं। आर्थिक सुधार और संरचनात्मक समायोजन हमारे समय के सबसे प्रचलित टर्म रहे। यही बताया गया लगातार कि निजी क्षेत्र में दक्षता होती है, जबकि सार्वजनिक क्षेत्र में काहिली। निजीकरण की आंधी से व्यापार, शिक्षा-स्वास्थ्य कुछ नहीं बचा। नतीजा, बडे़ पैमाने पर निजी क्षेत्र का विकास। स्कूल, कॉलेज, बैंक, हवाई जहाज, कूरियर और जाने क्या-क्या। मध्यवर्ग इसका सबसे बड़ा प्रवक्ता था।... लेकिन दक्षता का यह भ्रम बहुत जल्दी टूटने लगा। मल्टीनेशनल की नौकरियों में लाखों के पैकेज जल्द ही सिकुड़ने लगे। पब्लिक सेक्टर को लूटकर फूले निजी क्षेत्र के गुब्बारों में छेद होने लगे। जिसे क्रोनी कैपिटलिज्म कहते हैं, उसका सबसे विकृत रूप हमारी आंखों के सामने नाच रहा था और हम राष्ट्रवाद की अफीम पिए मस्त थे। कीमत चुकाई किसानों, मजदूरों और छोटे व्यापारियों ने। जेट न पहला है न आखिरी। समाजवाद को एक बदनाम शब्द और फेल स्वप्न सिद्ध करने वाले लोग पूंजीवाद की इस विफलता को कुछ पूंजीपतियों की गलती बताकर भटका रहे हैं। कहना बहुत कुछ है, कभी फुरसत में... अभी जावेद अख्तर का यह शेर- नर्म अल्फाज भली बातें मोहज्जब लहजे/ पहली बारिश ही में ये रंग उतर जाते हैं।

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  • Web Title:cyber sansar Hindustan column on 19 april