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गुजरा वक्त याद आया

 

 

मैं पहली बार स्वतंत्र प्रभार से दिल्ली गया 2005 में। एकदम इंडिपेंडेंट होकर, ‘यू नो सोलो ट्रैवलर।’ दिल्ली से सरकाघाट बस स्टैंड (हमीरपुर) वापस आया। रात का समय था। दिसंबर का महीना। पीछे वाले दरवाजे के साथ लगती खिड़की वाली सीट थी।
अपुन ने पूरे रास्ते खिड़की खुली रखी। रंग-बिरंगी लाइटें, चमचमाते होटल, बस के साथ-साथ भागती ट्रेनें, यह सब देखकर बहुते मज्जा आया। लेकिन पीछे बैठे लोगों के गठबंधन में दरारें आ गईं। ठंडी हवा से लोगों के नथुने जाम हो गए। लोग शोर मचा-मचाकर खिड़की बंद करवाते और मैं कुछ ही देर बाद चुपके से धीरे-धीरे दोबारा उसे खोल देता।
लोगों ने बुढ़ापे की दुहाई दी, अपनी जमती हड्डियों की गवाही दी, पर भाई नहीं माना। चंडीगढ़ पहुंचने-पहुंचने तक तो गृह युद्ध की स्थिति बन गई और आखिरकार मुझे वहां से उठाकर ड्राइवर के बिल्कुल सामने वाली सीट पर ट्रांसफर कर दिया गया।
अभी हाल ही में मैं बस में बैठा था। अपने आगे वाली सीट पर एक चतुरलिंगम टाइप का लौंडा बैठा था, जो चुपके से बार-बार खिड़की खोल पहाड़ियों के मजे ले रहा था। उसकी खिड़की ने मेरे जीवन मे ठंडा चरस बो दिया, पर भाई खिड़की बंद नहीं हो पाई- बसें वही हैं... हवाएं वही हैं... खिड़कियां वही हैं...बस बूढ़े बदल गए।

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  • Web Title:cyber sansar Hindustan column on 18 march