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भारत और लोकतंत्र

भारत विभाजनों का देश है। वर्ण विभाजन, गोत्र विभाजन, जाति विभाजन, धार्मिक विभाजन, अमीर-गरीब का विभाजन, पूंजीपति-मजदूर का विभाजन, डिजिटल समृद्ध-डिजिटल गरीब का विभाजन, छोटे-बडे़ का विभाजन आदि। भारतीय समाज बदल रहा है, मगर पुराने विभाजन खत्म नहीं हो रहे, बल्कि एक-दूसरे पर लदे हुए हैं। व्यक्ति एकाधिक विभाजनों की चपेट में है। निंदा संस्कृति व्यक्तित्वहीनता की अभिव्यक्ति है। निंदा में रस वे लोग लेते हैं, जो आधुनिक नहीं हैं। आलोचना की संस्कृति आधुनिक है। आलोचना से आधुनिक व्यक्तित्व का निर्माण होता है। जिस जाति, समुदाय या व्यक्ति को निंदा संस्कृति का अभ्यास होता है, वे घेटो में रहते हैं। निंदा घेटो में रखती है, रूढ़ियों में बांधे रखती है, जबकि आलोचना घेटो से बाहर निकालने में मदद करती है। रघुवीर सहाय ने लिखा है- मनुष्य के कल्याण के लिए/ पहले उसे इतना भूखा रखो कि वह और कुछ/ सोच न पाए/ फिर उसे कहो कि तुम्हारी पहली जरूरत रोटी है/ जिसके लिए वह गुलाम होना भी मंजूर करेगा/ फिर तो यह बताना रह जाएगा कि/ अपनों की गुलामी विदेशियों की गुलामी से बेहतर है/ और विदेशियों की गुलामी वे अपने करते हों/ जिनकी गुलामी तुम करते हो तो वह भी क्या बुरी है/ तुम्हें तो रोटी मिल रही है एक जून।

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  • Web Title:cyber sansar Hindustan column on 16 march