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ट्रोल के दौर में

 

 

अखबार, न्यूज चैनल, वेब पोर्टल... में अब यह रूटीन की खबर हो गई है कि आज सोशल मीडिया पर कौन ट्रोल हुआ। ट्रोल का मतलब है- लिखने या कुछ पोस्ट करने के बाद खदेड़ा जाना। वर्चुअल स्पेस पर ऐसी हरकतों का शिकार बनाना कि जिससे लिखने-बोलने वाले को वैसी ही मानसिक तकलीफ पहुंचे, जैसी कि शारीरिक हिंसा या प्रताड़ना किए जाने पर होती है।
देखते-देखते ट्रोल एक ऐसी ताकत के रूप में मीडिया की ओर से स्थापित कर दिया गया है कि लिखने-बोलने से पहले आपके भीतर उसका डर बना रहे। कारोबार कर रहे इस मीडिया को शून्य लागत में रोज एक स्टोरी मिल जाती है। वह भी कुछ मिनट लगाने पर ही। लेकिन सवाल यह है कि ट्रोलिंग करने की यह मानसिकता किसने पैदा की? किसने इसे लगातार बढ़ावा दिया? कौन असहमति या मानवीय चूक को अपराध मानकर आपको खदेड़ता है, इस पर ये चुप होते हैं?
कारोबारी मीडिया को यह बात अच्छी तरह से पता है कि जिस दिन लोकतंत्र सही मायने में काम करने लग जाएगा, कारोबार की लागत बढ़ जाएगी और मुनाफा कम हो जाएगा। यह अलग बात है कि वे खुद इसी लोकतंत्र के भीतर हैं और उन्हें भी इसी में जीना है। लोकतंत्र जब जर्जर होगा, तो उनकी भी जिंदगी उतनी ही तबाह होगी।

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