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संसद और महिलाएं

भारत में महिलाएं कुल जनसंख्या का करीब 48 फीसदी हैं, लेकिन रोजगार में उनकी हिस्सेदारी सिर्फ 26 फीसदी की है। न्यायपालिका और केंद्र व राज्य सरकारों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व काफी कम है। पंचायतों में, जहां महिलाओं के लिए आरक्षण किया गया, वहां उनके नाम पर पति या बेटे निर्वाचन से मिली ताकत का उपयोग कर रहे हैं। इन सब चिंताओं के बीच यूएनडीपी की वह रिपोर्ट भी है, जिसके मुताबिक महिलाओं के सशक्तीकरण में अफगानिस्तान को छोड़ सभी दक्षिण एशियाई देश भारत से बेहतर हैं। यह भी एक तथ्य है कि संसद में महिला प्रतिनिधित्व के वैश्विक औसत में भारत का स्थान बहुत नीचे है।

543 सीटों वाली लोकसभा में इस समय 62 महिला सांसद हैं, इससे पहले 2009 में 58 महिलाएं थीं। थोड़ा सा ग्राफ बढ़ा, मगर 33 फीसदी आरक्षण के हवाले से तो यह नगण्य ही कहा जाएगा। पितृसत्तात्मक संरचना वाले समाज में घर हो या दफ्तर, सड़क हो या संसद- स्त्रियों के विकास का नारा खूब पीटा जाता है, पर उनके हितों को लेकर कोई ठोस कार्ययोजना नहीं दिखती। नवीन पटनायक ने अपने यहां लैंगिक समीकरणों को टटोलते-परखते हुए 33 फीसदी आरक्षण की घोषणा कर दी, पर अन्य दलों को सांप क्यों सूंघा- यह तो मतदाताओं को पूछना ही चाहिए।

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  • Web Title:Cyber Sansar Hindustan Column on 14 March