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गांधी पर कुछ रचते हुए

इन दिनों महात्मा गांधी पर एक नाटक लिख रहा हूं और इस सिलसिले में मुझे कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। खासकर फॉर्म को लेकर। दरअसल, गांधी के जीवन में इतने फॉर्म हैं कि उन सबको एक नाटक में लाना असंभव है, बल्कि उनमें से कुछ को समेट लाना भी आसान नहीं है। जैसे, गांधी का आंदोलन करना, आंदोलन वापस लेना, जेल जाना, उपवास करना, पैदल चलना, मौन रखना, अदालत में एक वकील के तौर पर जिरह करना, चरखा चलाना, खादी बुनना, बीमार लोगों की सेवा करना, प्रार्थना करना, ब्रह्मचर्य के प्रयोग करना, कानून तोड़ना, साफ-सफाई पर ध्यान देना, लिखना, उनकी हत्या- ऐसे ही कई
और रूप हैं।
इस क्रम में मैं इसी निष्कर्ष पर पहुंचा कि दुनिया में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हुआ हो, जिसके पास इतने तरह के फॉर्म हैं। महात्मा गांधी का जीवन तो महान है ही, कला की दृष्टि से भी उनके पास इतनी चीजें हैं कि रंगकर्मी उनसे बहुत कुछ सीख सकते हैं।
मेरा एक निष्कर्ष यह भी है कि गांधीजी की जिंदगी के एक-एक दिन के घटनाक्रमों पर नाटक लिखे जा सकते हैं और शायद दक्षिण अफ्रीका जाने के बाद से उनके जीवन का कोई भी ऐसा दिन नहीं है, जो हलचलों से भरा न हो।

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  • Web Title:cyber sansar Hindustan column on 12 january