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प्रेम की बदली परिभाषा

 

 

मौजूदा उपभोक्ता समाज में मीडिया लगातार हमें अन्य के प्रति हमारी जिम्मेदारी के भाव से दूर ले जा रहा है। दूसरों के प्रति जिम्मेदारी के भाव से दूर जाने के कारण ही हम आत्मकेंद्रित होते जा रहे हैं। ऐसा वातावरण बना दिया गया है कि स्वयं ज्यादा से ज्यादा उपभोग कर रहे हैं। हम नहीं सोचते कि इससे किसे क्षति पहुंच रही है? हम सिर्फ एक विचार में कैद होकर रह गए हैं कि हमें कोई एक व्यक्ति चाहिए, जो हमें प्यार करे। उसके साथ जी सकें। इसके लिए सिर्फ एक काम और करना है- ज्यादा से ज्यादा धन कमाना। हम जिस व्यक्ति को प्यार करते हैं, उसके लिए ज्यादा से ज्यादा चीजें खरीदनी हैं। 
हमारी हिंदी फिल्मों के गाने कितना ही ज्यादा प्रेम का राग अलापें, सच्चाई यही है कि प्रेम के इस कोलाहल में हमने अपने अंदर के दरवाजे बंद कर लिए हैं। हमने अपने पड़ोसी की जिंदगी से आंखें बंद कर ली हैं, बल्कि उस पर संदेह करने लगे हैं। पड़ोसी को जानने की बजाय उसके प्रति अनजानापन हमारी सबसे बड़ी शक्ति हो   गया है। मीडिया ने प्रेम का ऐसा वातावरण बनाया है कि हम अपनी ही दुनिया में कैद होकर रह गए हैं। घर में ही हमारे सबसे घनिष्ठ आंतरिक संबंध कैद होकर रह गए हैं। विश्व के साथ पैदा हुए इस अलगाव को हम प्रेम कहते हैं!
    
 

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  • Web Title:cyber sansar Hindustan column on 12 february