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राय थोपते मजबूत नेता

दुनिया के सभी तथाकथित प्रभावशाली नेता अपनी राजनीति यूं पेश करते हैं कि वे जनता की मर्जी को स्वीकारते हैं और खुद की तरक्की के लिए काम करने वाले एलिट के खिलाफ हैं। अपनी इसी खासियत के चलते वे चुनाव जीतने में सफल हो जाते हैं। लेकिन असल में वे करते इसके ठीक उलटा हैं। मिसाल के तौर पर, तुर्की में राष्ट्रपति एर्दोगन के दामाद केंद्रीय बैंक के अध्यक्ष हैं। ऐसे में, आर्थिक मामलों में आप किसी को घेर ही नहीं सकते। ऐसा ही हंगरी में देखा जा सकता है और रूस में भी। यह पतन चीन में भी शुरू हो गया है। वहां राष्ट्रपति शी जिनपिंग अपनी विचारधारा थोप रहे हैं। अगर वहां केंद्रीय बैंक ऐसी कंपनियों को कर्ज देते रहेंगे, जिनमें सरकार की हिस्सेदारी है, तो इसमें चूक की बड़ी आशंका है। प्रभावशाली नेता दावा करते हैं कि उनकी राय असल में जनता की राय है। पर यह तरीका जनता की स्वतंत्रता पर भारी पड़ता है, खासकर आर्थिक स्वतंत्रता पर। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को भी ह्वाइट हाउस में अपनों को नौकरियां दिलवाने में जरा भी संकोच नहीं हुआ। अमेरिका एक लोकतंत्र है, लेकिन रूस, चीन, तुर्की और हंगरी में तो हालात अलग हैं। ये सभी देश आर्थिक मोर्चे पर पतन की राह पर हैं, क्योंकि जब लोकतंत्र का पतन होता है, तब अर्थव्यवस्था भी टिकी नहीं रह सकती।

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