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असाधारण शख्सियत

उनसे बेंगलुरु लिटरेचर फेस्टिवल में दो मुलाकातें हुई थीं। जब मैं उनसे पहली बार मिला, तो वह इस बात से बहुत खुश हुए कि सिनेमा से अधिक मैं उनके नाटकों के बारे में उनसे बात कर रहा था। या शायद अपनी उत्सुकता में  लिखने के प्रभाव और प्रक्रिया पर उनको सुन रहा था। मुझे ठीक से याद है कि हमने सिर्फ तीन फिल्मों की चर्चा की, जिनमें स्वामी, निशांत  और सुर-संगम  शुमार हैं। कारनाड उत्साहित होकर मुझसे सुर-संगम  के बहाने उसकी मूल तेलुगु फिल्म शंकराभरणम  की बात करते रहे। अपनी फिल्मों से परे उन्होंने के विश्वनाथ की इस कालजयी फिल्म में शंकर शास्त्री का किरदार निभाने वाले जे वी सोमायाजुलु की एक्टिंग को ऐसे सराहा कि लगा, जैसे वह उनसे अभिनय की बारीकियों को आज भी सीखना चाहते हों। लेकिन उनके लेखकीय सरोकार देखने लायक थे। जब उनसे नाटकों पर बात होने लगी, तो उनके लेखक का उदात्त चेहरा उभर आया। जिस आत्मविश्वास और कुछ-कुछ आत्मरंजना के साथ वह सूक्ष्मता से अपने नाटकों के बारे में बतियाने लगे, उसे सुनना अलग ही अनुभव था। उनसे दूसरी संक्षिप्त सी मुलाकात इसी समारोह में कुछ साल बाद हुई। उन्होंने पहचाना और बड़ी आत्मीयता से मिले। मुझे उनका अपने नाटकों पर पुलकित होकर बतियाना हमेशा याद रहेगा।

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  • Web Title:cyber sansar hindustan column on 11 june