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आदर्श से दूरी क्यों

हिंदी में आम समझ है कि ‘जो है’ वह यथार्थ है और ‘जो होना चाहिए’ वह आदर्श। इसी समझ के आधार पर यथार्थवाद को यथातथ्यवाद माना जाता है और आदर्शवाद को उसका विरोधी। इसी समझ से प्रेमचंद के ‘आदर्शोन्मुख यथार्थवाद’ को यथार्थवाद नहीं माना गया। यही नहीं, उनकी कुछ अंतिम रचनाओं को ही यथार्थवादी माना गया और बाकी को आदर्शवादी बताकर खारिज किया गया। यह नहीं समझा गया कि यथार्थ वह भी है ‘जो हो सकता है’ और ‘जो होना चाहिए’। हिं

दी लेखकों को गर्व होना चाहिए था कि हमारे प्रेमचंद ने साहित्य को ‘आदर्शोन्मुख यथार्थवाद’ दिया। उन्हें इसे अपनाकर आगे बढ़ाना चाहिए था। मगर उन्होंने आदर्शवाद को प्रेमचंद की कमजोरी माना। इससे उन्हें या साहित्य को क्या फायदा हुआ, यह तो पता नहीं, पर नुकसान यह जरूर हुआ कि स्वयं को यथार्थवादी समझने वाले लेखक ‘जो है’ उसी के चित्रण को यथार्थवाद समझते रहे और ‘जो होना चाहिए’ उसके चित्रण से बचते रहे।

उनकी इस सोच का कुछ प्रभाव उनके जीवन और आचरण पर भी जरूर पड़ा होगा। आदर्शोन्मुख यथार्थवाद मनुष्य को प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपने विचार या सिद्धांत पर दृढ़ रहने, संघर्ष से न घबराने और लोभ-लालच में पड़ने से बचना सिखाता है।

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