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छपने का रोग 

आज से पांच वर्ष पहले यूनिसेफ के सहयोग से हमने अपने गांव में बच्चों के लिए एक फिल्म फेस्टिवल का आयोजन किया था। उसमें 400 से अधिक बच्चे इकट्ठा हुए थे, अद्भुत अनुभव मिला और सबसे बड़ी बात कि खुशी मिली। पर उस आयोजन के जरिए एक अलग अनुभव हासिल हुआ, जिसे हम रोग भी कह सकते हैं। यह रोग दरअसल अपने काम के मीडिया में छपने-छपाने से संबंधित है। 
हम जो कुछ कर रहे हैं, उसे छपाने की लिप्सा बड़ी खतरनाक बात होती है, और जब आपका काम छप जाता है, तो वह खतरनाक रोग की तरह आपके भीतर समा जाता है। जिस फिल्म महोत्सव की मैंने ऊपर बात की, उसके कार्यक्रम को स्वयं अखबार तक पहुंचाने का ज्ञान किसी ने दिया था और जब हमने मना किया, तो मामला बिगड़ गया। खैर, पत्रकारिता की समझ रखने की वजह से उस बिगड़े मामले की गंदगी को छूने से बच गया, पर अनुभव यही रहा कि काम पर ही केवल भरोसा करना चाहिए, काम करते हुए खुद ही खबरों में बने रहने की बीमारी तेजी से एक संक्रामक रोग की तरह फैल रही है। जो भी अच्छा या कुछ अलग समाज में हो रहा है, उस पर पर मीडिया की नजर जाए, अच्छी बात है, मगर खुद ही मीडिया की आंख बन जाना ‘डायबिटीज’ है। 

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  • Web Title:cyber sansar Hindustan column on 10 may