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रोटी और धर्म

शिकागो में विश्व धर्म संसद के मंच से 20 सितंबर, 1893 को स्वामी विवेकानंद एक ऐसी बात कह गए थे, जिसकी अहमियत आज भी बहुत बड़ी है- पूरब की दुनिया की सबसे बड़ी जरूरत धर्म से जुड़ी हुई नहीं है। उनके पास धर्म की कमी नहीं है, मगर भारत की लाखों पीड़ित जनता अपने सूखे गले से जिस चीज के लिए बार-बार गुहार लगा रही है, वह है रोटी। भूख से मरती जनता को धर्म का उपदेश देना, उसका अपमान है। 
स्वामी विवेकानंद ने धर्म संसद में अपना अंतिम भाषण 27 सितंबर, 1893 को दिया था। उनका वह संदेश दुनिया को सदियों तक राह दिखाता रहेगा- ‘धर्म संसद ने दुनिया के सामने साबित कर दिया है कि पवित्रता, शुद्धता और उदारता, दुनिया के किसी एक धर्म की मिल्कियत नहीं हैं। सभी धर्मों ने सर्वश्रेष्ठ गुणों वाले महान पुरुषों और महिलाओं को जन्म दिया है। इस बात के साबित होने के बाद भी अगर कोई व्यक्ति सिर्फ अपने धर्म के आगे बढ़ने और बाकी धर्मों के नष्ट होने का सपना देखता है, तो मुझे उस पर तरस आता है। मैं ऐसे लोगों को बताना चाहूंगा कि तमाम विरोधों के बावजूद हर धर्म के बैनर पर बहुत जल्द लिखा होगा, ‘युद्ध नहीं, सहयोग’, ‘विनाश नहीं, मेल-मिलाप’, ‘आपसी कलह नहीं, शांति और सद्भावना।’

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  • Web Title:cyber sansar Hindustan column on 10 july