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बातूनी लोगों की बदौलत

मौन की महिमा में बहुत कुछ कहा गया है, लेकिन सच्चाई है कि बातूनी लोगों ने इस दुनिया को अलग ही सुंदर बनाया। बातूनी यूनानियों ने। बातूनी सुमेरियों ने। बातूनी चीनियों ने। बातूनी भारतीयों ने। हमारे प्राचीनतम बातूनी पुरखों ने।
किताबें भी बातूनी होती हैं।

प्लेटो कहता था, ‘किताब मूर्ति जैसी होती है। उससे आप बातें तो खूब करते हैं, लेकिन वह जवाब नहीं देती।’ उसने कुछ गलत नहीं कहा। ऐसा अब भी कई लोग कहते हैं, लेकिन ऐसी ही बातें पढ़कर मन में वह पंक्ति गूंजती है कि सोच-समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला....

किताबें जवाब भी देती हैं, और अच्छे से देती हैं। बस, उनका तरीका अलग होता है। कई बार तो किताब खत्म हो जाती है, पर उसकी बातें खत्म नहीं होतीं।

वह ग्रंथ ही क्या, जो तुम्हारे भीतर की किसी ग्रंथि को न खोल दे? ग्रंथि यानी गांठ। खुली, तो बातें भर्रर्रर्र से निकलती हैं। टूटे बांध से पानी की तरह।

लेखक और पाठक एक ही गोत्र के होते हैं। दोनों इब्ने बातूनी हैं, यानी बातूनियों की संतति।
मुझे एक किताब ने जन्म दिया है- यह कल्पना कितनी एब्सर्ड, लेकिन कितनी प्यारी है!
 

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  • Web Title:cyber sansar Hindustan 10 september