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बकलम खुद संजीव कुमार

‘अकबर बादशाह कब हुए और गरमियों में आगरा का तापमान कितना रहता है, इन दो सवालों के बीच सिवा इसके क्या फर्क है कि दोनों मास्टरजी का खौफ पैदा करते हैं, मुझे आज तक ठीक से नहीं मालूम। ठीक इसी तरह, मुझे यह भी मालूम नहीं कि किसी फिल्म में हीरो की भूमिका के बीच मूल भेदभाव क्या होता है? मैं पढ़ने में बहुत तेज होता, प्रथम श्रेणी में पास हुआ करता, तो आज प्रोफेसर, वकील, इंजीनियर या डॉक्टर हो जाता। मेरे शौक ने मुझे अभिनेता बना दिया। 

मैं फिल्मों में आया, तो एक्स्ट्रा बनाया गया, जिसे भीड़ में खड़े रहकर अभिनय का अपना शौक पूरा करना पड़ता है। अब इसे किस्मत ही कहना चाहिए कि उस भीड़ से उठकर मुझे छोटी-छोटी भूमिकाएं करने का मौका मिला।... एक बात, जिसका मैंने शुरू से ध्यान रखा, वह थी कि किसी काम को छोटा समझकर इनकार न करो। काम न करके नाम बढ़ेगा, यह तर्क मेरी समझ में नहीं आ सका। मैंने कभी किसी भूमिका को छोटा नहीं माना। मेरा ख्याल है कि जहां कहीं भी कला का सवाल आता है, वहां कोई वर्गीकरण बेमानी ही है। हर कोई अपनी ओर से सर्वश्रेष्ठ करने का प्रयत्न करता है, लेकिन इस तथ्य से इनकार नहीं कि कोरी कला कहीं जीवित नहीं रह सकती, जब तक कि उसे व्यापार का आश्रय प्राप्त न हो।’

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  • Web Title:Cyber Sansar column on 8th November