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एक थी तीस्ता

अनुभूति शांडिल्य उर्फ तीस्ता। यही नाम था उसका। सिर्फ 17 साल की सोन चिरैया। वीर रस से ओत-प्रोत वह सुंदर भाव रचती थी। बिहार की तीजन बाई कहने लगे थे लोग उसे। पहली बार उसे तब देखा, जब पटना एम्स में भर्ती उसकी तस्वीर फेसबुक पर कुछ मित्रों ने साझा की थी। गहन पीड़ा में भी उसे अपनी कला और उम्मीदों का ताना-बाना बुनते एक वीडियो में सुना, तो दिल में हूक सी उठी। उसकी तबीयत बिगड़ने की खबरें जिस तरह मित्रगण पोस्ट कर रहे थे, उससे मन डर रहा था। वह मेरी कोई नहीं थी, लेकिन बिटिया जैसी ही थी। उसकी कला और उसके नाम के साथ जुड़ी संवेदनाओं से मन एकाकार हो गया और मन ही मन मना रहा था कि बच्ची किसी तरह जल्दी से ठीक हो जाए। लेकिन सोन चिरैया उड़ गई। पिंजड़ा खाली हो गया। तीस्ता की याद में जाने कितनी पोटलियां बार-बार बंधेंगी, खुलेंगी, जिन-जिन मंचों पर उसने अपनी कला को जिया, उनके दरो-दीवार से उठती हुई सरगोशियां पूछेंगी- अरे तीस्ता कहां है? ठेठ भोजपुरी में जिन-जिन से वह बतियाती थी, उसकी खनक अब कौन सहेजेगा? तीस्ता तुम नहीं हो, पर जब-जब हम तुम्हें याद करेंगे, तुम्हारी ओजपूर्ण शैली को आत्मसात कर किसी सांगीतिक आलोक में तनकर खड़े हो जाएंगे। काश! कुछ दिन और जी लेती तुम।  

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  • Web Title:cyber sansaar article in Hindustan on 30 august