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श्रम से स्वाद

बेंगलुरु के सिर्फ एक इलाके कोरमंगला में 500 से अधिक रेस्टोरेंट, कैफे और खाने-पीने की जगहें हैं। हर शनिवार- इतवार को लोगबाग कैफे-दर-कैफे भटकते रहते हैं। दुर्लभ और अद्वितीय स्वाद की उनकी खोज जैसे पूरी ही नहीं होती। इसी रेलमपेल में भटकते हुए एक दिन आत्मज्ञान हुआ कि स्वाद का संबंध भूख से है, भूख का संबंध श्रम से है और श्रम का संबंध प्रकृति से। मेहनत करेंगे तो भूख लगेगी, भूख लगेगी तो खाने का स्वाद आएगा। दूसरी तरफ, स्वाद सिर्फ पकाने की चीज नहीं है, उगाने की चीज भी है। सिर्फ बंगाल में 5,500 प्रकार के धान उगते थे- इनमें लाल चावल के 50 प्रकार, सुगंधित चावल के 60 प्रकार शामिल थे। सोचिए 60 अलग-अलग प्रकार के सुगंध! धीरे-धीरे धान की अधिकांश प्रजातियां लुप्त हो गईं। दुनिया भर की पाक कला के किताबी ज्ञान को एक जगह इकट्ठा करके भी लुप्त हुई इन 5,500 प्रजाति के स्वाद की भरपाई कैसे कर पाएंगे? भूख, श्रम, प्रकृति के साथ-साथ स्वाद का संबंध सामाजिक समानता और सद्भावना से भी है। जब बंगाल में सुगंधित चावल की 60 किस्में हुआ करती थीं, तब भूख से मौतें भी होती थीं। तो सामाजिक समानता के लिए संघर्ष और प्रकृति से जुड़ने की कोशिश कीजिए। जीवन में स्वाद लौट आएगा। बाजार और पैसे से स्वाद का बड़ा दूर का संबंध है।

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  • Web Title:cyber sansaar article in Hindustan on 11 January